पृष्ठ:सुखशर्वरी.djvu/२२

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सुनशर्वरी। - PERSO9000899 चतुर्थ परिच्छेद. 000000000 - भागीरथी तट। "किमत्र चित्रं यत्सन्तः परानुग्रहताराः। न हि स्वदेहशैत्याय जायन्ते चन्दनद्रुमाः॥" (कालिदासः) नाथिनी भग्नगृह से निकल कर जाती थी कि उसके ( अ) कानों में यह भयानक शब्द,-'मा कात्यायनी ! कब - मैं नरबलि देकर निश्चिन्त होऊँगा ?'- बज्र सा सुनाई दिया। बालिका दौड़कर उसी अश्व के पीछे जा लकी और आड़ में से देखने लगी कि, 'पशुचर्म को पहिरे, . नरकपाल हाथ में लिये, भयानक रूप बनाये, पर्बताकार कापालिक उस भग्नगृह में घुसा!' यदि अनाथिनी क्षण भर भी वहां और बिलम्ब करती तो जरूर कापालिक के हाथों पड़ती। बालिका के कानों में कात्यायनी का नाम अमृत सा लगा, परन्तु कापालिक का जघन्य और हत्यारा रूप देख कर वह कांप उठी'! कापालिक के घर में जाते ही भय से अनाशिनी वहांसे भागी तो सही, पर भय से जल्दी जल्दी पांव नहीं उठते थे। जैसे स्वप्न में कोई आदमी भय के मारे भागने की चेष्टा करता है, परं उसका पैर नहीं उठता; उसी प्रकार अनाथिनी की दशा हुई। रह रह कर पीले फिर कर वह देखने लगी, और पत्रों के मर्मर शब्द से उसका कलेजा कांपने लगा । वह प्राणपण से दौड़ती दौड़ती पूर्वोक्त तिरमुहानी पर आ गई। अब आशा हुई कि प्राण बचेंगे, पर साथ ही भाई की चिन्ता ने चित्त चञ्चल कर दिया । उसने सोचा कि कोई काम भी नहीं सुधरा।' इत्यादि नाना चिन्ता करती करती वह आगे चली। कुछ दूर जाकर उसने देखा कि, 'किसी घर में आग लगी है!' परन्तु पास जाकर देखकर स्तम्भित हुई, क्योंकि वह आग बुढ़िया की कुटी में लगी थी! हाय! किसने अनाथिनी के सामान्य माश्रय को फंक दिया ? शब उस बाला