पृष्ठ:सुखशर्वरी.djvu/५२

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सुसरापस। - आड़ में पालथो जमाकर सब सामग्री पेटरूपी मिशाल गड़हे में उन्होंने ढूंस ली। अब सूर्य्यदेव मध्याकाश में पहुंच गए थे। भोजन करके प्रेमदास ने बड़ी खोज-खाज पर एक तालाब देखा, और देह मांजने के लिये उममें वे कद पड़े ! सरला और सुबदना की अनेक चिन्ताएं दूर हुई, क्यों कि उसी समय वहां पर सानाधिनी पहुंच गई थी। पहिले तो सरला का मुंह सूख गया,फिर डरते डरते उसने अपने भाई का हाल पूछा। अनाथिनी ने कुछ उत्तर नहीं दिया, किन्तु यह खिलखिला कर हँसनेलगी। इतने दिनों में आज अनाथिनी के मुंह पर हँसी दिखाई दी थी। - सरला ने आह्लादित होकर पूछा,-"भैया कहां हैं? क्या उन्हें तुम छुड़ा लाई ? ऐं ! अहां तुमने उन्हें देखा था, वहीं थे ? किस अवस्था में वे थे? कापालिक ने उन्हें कैसे छोड़ा ?" . अनाथिनी ने सरला की सब बातों का उत्तर केवल एक अक्षर "ना!" से दिया। सरला ने उत्सुक होकर पूछा,-"भैया कहां थे, और अब वे कहां हैं ?" अनाथिनी.-"कहां थे! जहां हमलोग थीं. वहीं !" सरला कुछ चञ्चल होकर बोली,-"अरे ! मेरे तो प्राण गए और तुम्हें हँसी सूझी है ! इस समय हँसी को ताक पर धर दो। देखो तो सही! छोकडी ने भतार पाकर रसिकता की पराकाष्ठा दिखा दी!-बोलोजी, बोलो जल्दी! भैया कहां हैं ?" अनाथिनी ने फिर हँसकर कहा.-"पान्थनिवास की जिस कोठरी में हमलोग थीं, उसीके बगल में वे भी थे।" सरला,-"वहां उन्हें कौन लाया और कापालिक के हाथ से किसने छुड़ाया ?" अनाथिनी,-"एक उदासीन ने कापालिक के हाथ से उनका उद्धार किया ।" सरला,-"कौन उदासीन ? और कैसे छुड़ाया ?" अनाथिनी,-"एक दिन के उदासीन कापालिक के भग्नगृह के पास भ्रमण करते थे। रात्रि भीषण मूर्ति धारण किए बन में राज्य करती थी। उसी समय उन्होंने देखा कि, 'भागीरथी के