पृष्ठ:सुखशर्वरी.djvu/५४

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सुस्वशर्बरी। mamIAvvvhnni..../NAANIMViv अनाधिनी, सरला ! भग्नगृह से आकर मैंने देखा कि, 'पांथनिवास जलता है !" मैंने भीतर जाकर तुमलोगों को वहां नहीं देखा, फिर बाहर आकर तुम्हारे भाई का आर्तनाद सुना, तब उदासीन की सहायता से तुम्हारे भाई को एक निरापद स्थाब में रख आई हूं। उनका कोई अनिष्ट नहीं हुआ है। उदासीन के अनन्त यत्न से उन्होंने आरोग्य लाभ किया है। पालकी भाड़ा करके उन्हें घर भेज कर तुमलोगों को खोजने मैं यहां आई हूँ।" सरलो,-" आह ! प्राण बचे! मई ! सखी ! तुम धन्य हो! भावी पति के उद्धार के लिये तुमने क्या नहीं किया ! अच्छा! . वे हमलोगों के परम उपकारी उदासीन कहां हैं ? गहा ! वे क्यों उदासीन हुए हैं ? " ___ अनाथिनी,- अपनी चाह की वस्तु नहीं पाने से इस कोमल सुकुमार वय में वे उदासीन हुए हैं।" सरला,-"चे किसे चाहते हैं ? अनाथिनी.-" किसे चाहते हैं ? अरे, एक सामान्य उदासीन की बात पूछकर तुम क्या करोगी?" सरला, “वाह भाई ! क्यों न पूछू ! वे हमलोगों के परम उपकारी हैं। यदि उनका तिल भर भी प्रत्युपकार मैं कर सकें तो अपने को धन्य समझ !" अनाथिनी,-" तुम उनका अशेष उपकार कर सकती हो परन्तु---- - सरला,-" परन्तु क्या ? अनाथिनी ! बताओ, मैं कैसा और कौन सा उनका उपकार कर सकती हूँ!" अनाथिनी,-"तुम अवश्य करोगी ?" सरला,-"कहँगी, प्राण जो देना पड़े तो वह भी अनाथिनी,-" स्वीकार करती हो न? केवल प्राण नहीं देना पड़ेगा, मन और प्राण दोनों देने पड़ेंगे !" सरला,-" यह क्या ? अनाशिनी!" अनाथिनी,-" तो फिर प्रतिज्ञा क्यों की ? अब उनकी अभिलाषा पूर्ण करो !" __यह कहती हुई गनाथिनी मन्दिर के बाहर आई और थोड़ी - --~rari sी ।