पृष्ठ:सुखशर्वरी.djvu/५६

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4. सुखशर्वरी। v VAAAAnnu - vvvnavinrvvvv.injanavaronwrohnAnnanonv.ru 9009APANOPAN CENTER dhow दशम परिच्छेद प्रेमप्रसंग। "असारभूते संसारे, सारभूता नितम्बिनी । इति सञ्चिन्त्य वै शम्भुरङ्गि पार्वती दधौ ॥" . (कलाधरः) नजन र परम आह्लादित हुए । अनाधिनी छल करके टल गई थी। सो एकान्त में सरला और सुजनकुमार से जो प्रेम सम्भाषण हुआ, उसे लिखने का हमारा अधिकार नहीं है; यदि हृदय हो तो प्रेममयी प्रियपाठिकागण उसका मर्म स्वयं समझ लें । उदासीन का नाम सुजनकुमार था। सुबदना एक ब्राह्मण की कन्या थी। उसकी जब सात वर्ष की अवस्था थी, तो उसके विवाह की बात ठहरी; किन्तु अभाग्यवश सब बात पक्की होने पर ब्याह होने के एक दिन पहिले उसका भावी पति परलोक सिधारा ! अनन्तर जाति के कट्टर और पुराने टाइप के बकधार्मिक लोग सुबदना की माता के ऐसे विपक्ष हुए और बार-बार धमकाने लगे कि, 'यदि अब इस लड़की का पुनर्विवाह करेगी, तो तुझे जात से काट देंगे, क्योंकि यह विधवा होगई!' इत्यादि असभ्य बातें सुनकर सुबदना की मां नितान्त मृयमाणा हुई, पर वह बिचारी क्या करती, और सुबदना से ब्याह कौंन करता ? यह कौन सुनता या मानता कि, "पतित्वं सप्तमे पदे " के अनुसार सुबदना अभी बिलकुल क्वारी है और केवल वाग्दान भर हुआ है ! खैर ! सुबदना की मां अनाथ एकादश वर्ष की कन्या सबदना को छोड़कर मर गई । सबदना पढ़ी लिखी और धर्मभीरु थो । उसने प्राणपण से अपने सतीत्व की आज तक - रक्षा की, इसीसे हमने सबदना को भद्धविधवा लिखा था! सपदना पहिले ही से प्रेमदास को मन ही मन चाहती थी, पर भय से यह यात प्रगट नहीं करती थी। आज दैवी घटना से ऐसा समय आया कि सब बातें खुल गई, और प्रेमदास ने भी शास्त्ररीति से उससे ब्याह करना स्थिर किया । सुबदना अद्वितीय