खिलौना मेरो ॥ जादिनते तुम्हसों विछुरे हम कोउ न कहत कन्हैया । भोरहि नाहिं कलेऊ कीनो सांझ न पयपीयो नापैया ॥ कहत न बन्यो संदेशो मोपै जननि जितो दुख पायो।अब हमसों वसुदेवं देवकी कहत आफ्नो जायो । कहिए कहा नंदवावासों बहुत निठुर मन कीनों । सूर हमाह पहुँचाइ मधुपुरी बहुरो शोध नलीनों ॥६१॥ पुनः नंदवचन ॥ सारंग॥ हमते कछु सेवा न भई ।धोखे धोखे रहे धोखही जाने नाहिं त्रिलोक मई ॥ चरणपकरि करि विनती करिवो सब अपराध क्षमाकीवे । ऐसो भाग होइगो कबहूं श्याम गोदमें लीवे ॥ कहै नंद आगे ऊधोके एकवेर दरशन दीवे । सूरदास स्वामी मिलि अबकै सबै दोष गत कीवे ॥६२॥अथ सखावचन ॥ विलावलाभली वात सनियत है आज । कोऊ कमलनयन पठयो है तन बनाइ अपनो सो साज ॥ पूँछत सखा कहौ कैसे हैं अब नाहीं कछु करते लाज । कंसमारि वसुदेव गृह आए उग्रसेनको दीन्हाँ राज ॥ राजा भए ज्ञानही गयो सुख सुरभी सँग वन गोप समाज । अब सुनु सूर करै को कौतुक ब्रजमें नाहिंवसत ब्रजराज ॥६३॥ ॥ अथ बज नर नारीवाक्य ॥ सारंग ॥ वैसोइ रथ वैसोइ सव साज । मानहुँ बहुरि विचारि कछू मन मुफलकसुत आयो ब्रज आज ॥ पहिलेइ गमन गयो ले हरिको परम सुमति राथो रतिराज । अजहुँ कहा कीयो चाहतहै याते अधिक कंसको कान ॥ व्याध जो मृगन वधत सुन सजनी सो शर काढि संग नहिं लेत । यह अक्रूर कठिनकांना इहि ये इतनो दुख देत ॥ ऐसे वचन बहुत विधि काहि कहि लोचन भरि सींचत उरगात । सूरदास प्रभु अवधिजानिकै चली सबै पूँछन कुश लात ॥६४॥ रामकली ॥ ब्रिज घर घर सब होत वधाए।कंचन कलस व दधि रोचन महरि महर वृंदावन आए । मिलि ब्रजनारि तिलक शिरकीनो करि प्रदक्षिणा पास । पूंछत कुशल नारि नर हरपत आए सब ब्रजवास ॥ सकसकात तन धकधकात उर अकवकात सब ठाढे । सूर उपंगसुत बोलत नाही अतिहिरदै है गाढ ॥६५॥ सखीवचन गोपीमति ॥ धनाश्री ॥ आज ब्रज कोऊ आयो है । कैधौं बहरि अक्रूर क्रूरकै जियत जानि उठिधायो है ॥ मैं देख्यो ताको रथ ठाढो तुम सखी शोधन पायो है ॥
कैकरि कृपा दुखित जानिकै हरिसंदेश पठायो है ॥ चली मिलि सिमिटि सखी पूछनको उधो दरश दिखायो है । तब पहिचानि प्रभुको भृत कमल जोरि शिरनायो है ॥ हरिहैं कुशल कुशल है तुमहूं कुशल लोग जेहि भायो है ॥ वह नगर कुशल सूरज प्रभु करि सुदृष्टि जहाँ छायो है ॥६६॥ धनाश्री ॥ देख्यो नंद द्वार रथ ठाटो । बहुरि सखी सुफलकसुत आयो परयो संदेह जिय गाहो ॥ प्राण हमारे तबहिं गयो लै अब किहि कारण आयो । मैं जानी यह बात सत्यकै कृपाकरन उठि धायो । इतने अंतर आनि उपंगसुत तिहि क्षण दरशन दीन्हों । तब पहिचानि जानि प्रभुको भृतु परम सुचित मन कीन्हों ॥ तब परणाम कियो अति रुचि सों अरु सवही कर जोरे । सुनियत हुते तैसई देखे सुंदर सुमति सुभोरे ॥ तुम्हरो दरशन पाइ आ पनो जन्म सफल करि मान्यो। सूर सुऊधो मिलत भए सुख ज्यों खग पायों पान्यो ॥६७॥ धनाश्री ॥ बोलक इनहूको सुनि लीजै । कैसी उठनि उठे धौं ऊधो तैसे उत्तर काजै ॥ यामें कछू खर चियतु नाहीं अपनो मतो नदीजै । कहिरी सखी भगाए किहि उर चलहु जाइ मुख छीजै ॥ कर जोरि भई सन्मुख ठाढ़ी वचन कहो त्यों जीने । सूर सुमति सोई दीजै हरि वदन सुधारस पीजै ॥६८ ॥ नट ॥ ऊधो कहो हरि कुशलात । कहो आवन किधौं नाही बोलिए । मुख वात ॥ एक छिन युग जात हमको विन सुने हरि प्रीति । आइ आपै कृपाकीनी अपकहों कछु नीति ॥ तव उपंगसुत सबनि बाले सुनो श्रीमुख योग । सूर मुनि सब दौरि आई हटकि ।
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सूरसागर।
