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सेवासदन
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विट्ठलदास उनके पास नहीं गये थे, उनकी ओरसे हृदय फट गया था । लेकिन शर्माजीकी यह दशा देखतेही पिघल गये और प्रेमसे हाथ मिलाकर बोले , भाई साहब उदास दिखाई देते हो , कुशल तो है ?

शर्मा — जी हाँ, सब कुशल ही है, इधर महीनोसे आपकी भेंट नही हुई , मिलनेको जी चाहता था , सुमनके विषयमें क्या निश्चय किया ?

विट्ठल — उसी चिन्तामें तो रात-दिन पड़ा रहता हूँ । इतना बड़ा शहर है पर ३० ) मासिकका प्रबन्ध नही हो सकता । मुझे ऐसा अनुमान होता है कि मुझे माँगना नही आता । कदाचित् मुझमे किसीके हृदयको आकर्षित करनेकी सामर्थ्य नही है । मैं दूसरोंको दोष देता हूँ , पर वास्तवमें दोष मेरा ही है । अभीतक केवल १० ) का प्रबन्ध हो सका है ! जितने रईस है सबके सब पाषाण हृदय । अजी रईसों की बात तो न्यारी रही , मि० प्रभाकर राव ने भी कोरा जवाब दिया । उनके लेखों को पढ़ो तो मालूम होता है कि देशानुराग और दया के सागर है , होलीके जलसे के बाद महीनों तक आपपर विष की वर्षा करते रहे, लेकिन कल जो उनकी सेवामें गया तो बोले, क्या जातिका सबसे बड़ा ऋणी मैं ही हूँ , मेरे पास लेखनी है, उससे जाति की सेवा करता हूँ , जिसके पास धन हो, वह घनसे सेवा करे । उनकी बातें सुनकर चकित रह गया । नया मकान बनवा रहे हैं , कोयले की कंपनी में हिस्से खरीदे है, लेकिन इस जातीय कामसे साफ निकल गये । अजी , और लोग जरा सकुचाते तो है , उन्होने तो उल्टे मुझीको आड़े हाथ लिया ।

शर्माजी - आपको निश्चय है कि सुमनबाई ५० ) पर विधवाश्रममें चली आवेगी ?

विट्ठल – हाँ मुझे निश्चय है , यह दूसरी बात है कि आश्रम कमेटी उसे लेना पसन्द न करे । तब कोई और प्रबन्ध करूँगा ।

शर्मा — अच्छा तो लीजिये , आपकी चिन्ताओं का अन्त किये देता हूँ में ५० ) मासिक देने पर तैयार हूँ और ईश्वरने चाहा तो आजन्म देता रहूँगा ।

विट्ठलदास ने विस्मय से शर्माजी की तरफ देखा और कृतज्ञतापूर्ण