पृष्ठ:सेवासदन.djvu/१९५

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सेवासदन
 


वे हृदय जिनमें विशुद्ध निर्मल प्रेम का स्रोत बहना चाहिये था, कितने दुर्गंध विशाक्त मलिनता से ढँके हुए है। कितनी अधोगति है।

इन घृणात्मक विचारों सदन को कुछ शान्ति हुई। वह टहलता हुआ गंगातटकी ओर चला। इसी विचार में आज उसे देर हो गई थी। इसलिये वह उस घाट पर न गया। जहाँ वह नित्य नहाया करता था। वहाँ भीडभाड़ हो गई होगी। अतएव उस घाटपर गया जहाँ विधवाश्रम स्थित था। वहाँ एकात रहता था। दूर होने के कारण शहर के लोग वहाँ कम जाते थे।

घाट के निकट पहुँचने पर सदन ने एक स्त्री को घाट की ओर से जाते देखा। तुरन्त पहचान गया। यह सुमन थी, पर यह कितनी बदली हुई। न वह लंबे लंबे केश, न वह कोमल गति, न वह हंसते हुए गुलाब के से होठ, न वह चंचल ज्योति से चमकती हुई आँख न वह बनाव सिंगार, न वह रनजटित आभूषणों की छटा, वह केवल सफेद साडी पहने हुए थी। उसकी चाल मे गंभीरता औीर मुख से नैराश्य और वैराग्य भाव झलकता था काव्य वही था, पर अलंकार विहीन, इसलिये सरल और मार्मिक। उसे देखते ही सदन ने प्रेम से विह्वल होकर कई पग बड़े वेग से चला पर उसका यह रूपांतर देखा तो ठिठक गया, मानो उसे पहचानने में भूल हुई, मानो वह सुमन नहीं कोई और स्त्री थी। उसका प्रेमोत्साह भंग हो गया। समझ में न आया कि यह कायापलट क्यों हो गई? उसने फिर सुमन की ओर देखा वह उसकी ओर ताक रही थी, पर उसकी दृष्टि में प्रेम की जगह एक प्रकार की चिंता थी, मानो वह उन पिछली बातों को भूल गई है, या भूलना चाहती हैं। मानो यह हृदय की दी हुई आग को उभारना नहीं चाहती। सदन को ऐसा अनुमान हुआ कि वह मुझे, धोखेबाज और स्वार्थी समझ रही है। उसने एक क्षण बाद फिर उसकी ओर देखा। यह निश्चय करने के लिये कि मेरा अनुमान भ्रांतिपूर्ण तो नहीं है। फिर दोनों की आँखें मिली पर मिलते ही हट गई। सदन को अपने अनुमान का निश्चय हो गया। निश्चय के साथ ही अभिमान का उदय हुआ। उसने अपने मन को धिक्कारा। अभी अभी मैंने अपने को इतना समझाया है और इतनी ही देर में फिर उन्हीं