पृष्ठ:सेवासदन.djvu/२०३

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२३० सेवासदन

साधु—आधी रातको आपका गंगातट पर क्या काम हो सकता है?

कृष्णचन्द्र ने रुष्ट होकर उत्तर दिया, आपतो आत्मज्ञानी है। आपको स्वयं जानना चाहिये।

साधु——आत्मज्ञानी तो मै नही हूंँ, केवल भिक्षुक हूँ, इस समय में आपको उधर न जाने दूंगा।

कृष्णचन्द्र——आप अपनी राह जाइये। मेरे काममे विघ्न डालनेका आपको क्या अधिकार है?

साधु——अधिकार न होता तो मैं आपको रोकता ही नहीं। आप मुझसे परिचित नहीं है, पर मैं आपका धर्मपुत्र हूँ,मेरा नाम गजाधर पांडे हैं।

कृष्णचन्द्र——ओहो! आप गजाधर पांडे है। आपने यह भेष कबसे धारण कर लिया? आपसे मिलनेकी मेरी बहत इच्छा थी, मैं आपसे‌ बहुत कुछ पूछना चाहता था।

गजाधर——मेरा स्थान गंगातटपर एक वृक्षके नीचे है, चलिये वहाँ थोडी देर विश्राम कीजिये,मैं सारा वृत्तांत आपसे कह दूंगा।

रास्तेमे दोनों मनुष्यों में कुछ बातचीत न हुई। थोडी देर में वे उस वृक्षके नीचे पहुँच गये,जहाँ एक मोटासा कन्दा जल रहा था। भूमिपर पुआल बिछा हुआ था और एक मृगचर्म, एक कमंडल और एक पुस्तकों का बस्ता उसपर रखा हुआ था।

कृष्णचन्द्र आग तापते हुए बोले, आप साधु हो गये है, सत्य ही कहियेगा, सुमन की यह कुप्रवृत्ति कैसे हो गई?

गजाधर अग्निके प्रकाशमें कृष्णचन्द्रः मुखकी ओर मर्मभेदी दृष्टिगस देख रहे थे । उन्हे उनके मुखपर उनके हृदयके समस्त भाव अकिंत देख पड़ते थे । वह अब गजाधर न थे । सत्मग और विरक्तिने उनके ज्ञानको विकसित कर दिया था । वह उस घटना पर जितना ही विचार करते थे। उतना ही उन्हे पश्चात्ताप होता था । इस प्रकार अनुतप्त होकर उनका