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सेवासदन
 


निकाल देता, पर गुमनाम लेखों का छापना नियम विरुद्ध है, इसी से मजबूर था। शुभ नाम?

सदन ने अपना नाम बताया। उसका क्रोध कुछ शान्त हो चला था।

प्रभाकर-आप तो शर्माजी के परम भक्त मालूम होते है।

सदन--में उनका भतीजा हूँ।

प्रभाकर-ओह, तब तो आप अपनही है। कहिये, शर्माजी अच्छे तो है? वे तो दिखाई ही नहीं दिये।

सदन—अभी तक तो अच्छे हैं, पर आपके लेखों का यही तार रहा तो ईश्वर ही जाने उनकी क्या गति होगी। आप उनके मित्र होकर इतना द्वेष कैसे करने लगे?

प्रभाकर--द्रेष? राम राम! आप क्या कहते है? मुझे उनसे लेशमात्र भी द्वेष नहीं है। आप हम संपादकों के कर्तव्य को नहीं जानते। हम पब्लिक के सामने अपना हृदय खोलकर रखना अपना धर्म समझते हैं। अपने मनोभावों को गुप्त रखना हमारे नीत-शास्त्र में पाप है। हम न किसी के मित्र न है न किसी के शत्रु। हम अपने जन्म के मित्रों को एक क्षण में त्याग देते है और जन्म के शत्रुओं से एक क्षण में गले मिल जाते हैं। हम सार्वजनिक विषय में किसी की भूलों की क्षमा नहीं, करते, इसलिए कि हमारे क्षमा करने से उनका प्रभाव और भी हानिकारक हो जाता हैं।

पद्मसिंह मेरे परममित्र है और मैं उनका हृदय से आदर करता हूँ। मुझे उनपर आक्षेप करते हुए हार्दिक वेदना होती है। परसों तक मेरा उनसे केवल सिद्धान्त का विरोध था, लेकिन परसों ही मुझे ऐसे प्रमाण मिले हैं, जिनसे विदित होता है कि उस तरमीम के स्वीकार करने में उनका कुछ और ही उद्देश्य था। आपसे कहने में कोई हानि नहीं है कि उन्होंने कई महीने हुए सुमन बाई नाम की बेश्या को गुप्त रीति से विधवा आश्रम में प्रवृष्ट करा दिया और लगभग एक मास से उसकी छोटी बहन को भी आश्रम में ही ठहरा रक्खा है। मैं अब भी चाहता हूँ कि मुझे गलत खबर