पृष्ठ:सेवासदन.djvu/३०

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सेवासदंन
३३
 


अभी देश उनसे खाली नही है। वह दयावान होते है, सदाचारी होते है, सदा परोपकार मे तत्पर रहते है। भोली यदि अप्सरा बनकर आवे तो वह उसकी ओर आँख उठाकर भी न देखेंगे।

सुमन चुप हो गयी। वह गजाधर की बातों पर विचार कर रही थी।

दूसरे दिन से सुमन ने चिकके पास खड़ा होना छोड दिया। खोचे वाले आते और पुकार कर चले जाते। ठेले गजल गाते हुए निकल जाते। चिककी आड़ मे अब उन्हें कोई न दिखाई देती थी। भोली ने कई बार बुलाया, लेकिन सुमन ने बहाना कर दिया कि मेरा जी अच्छा नही है। दो-तीन बार वह स्वयं आई पर सुमन उससे खुलकर न मिली।

सुमन को यहाँ आये अब दो साल हो गए थे। उसकी रेशमी साड़ियाँ फट चली थी। रेशमी जाकटे तार-तार हो गई थी। सुमन अब अपनी मंडली की रानी न थी। उसकी बात उतने आदर से न सुनी जाती थी। उसका प्रभुत्व मिटता जाता था। उत्तम वस्त्रविहीन होकर वह अपने उच्चासन से गिर गई थी। इसलिए वह पडोसिनो के घर भी न जाती। पडोसिनो का आना जाना भी कम हो गया था। सारे दिन अपनी कोठरी में पड़ी रहती। कभी कुछ पढ़ती, कभी सोती।

बन्द कोठरी मे पड़े-पड़े उसका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। सिर में पीडा़ हुआ करती। कभी बुखार आ जाता, कभी दिल मे धड़कन होने लगती। मन्दारिन के लक्षण दिखाई देने लगे। साधारण कामो से भी जी घबराता, शरीर क्षीण हो गया और कमलका-सा वदन मुरझा गया।

गजाधर को चिन्ता होने लगी। कभी-कभी वह सुमन पर झुझलाता और कहता जब देखो पड़ी रहती है। जब तुम्हारे रहने से मुझे इतना भी सुख नही कि ठीक समय पर भोजन मिल जाय तो तुम्हारा रहना न रहना दोनो बराबर है, पर शीघ्र ही उसे सुमन पर दया आ जाती। वह अपनी स्वार्थपरतापर लज्जित होता।