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सेवासदन
 


न टालता। माँ-बाप की बातो पर कान न धरता, प्राय: सम्मुख विवाद करता। लेकिन चचा के सामने वह शराफत का पुतला बन जाता था। उनके ठाट-बाट ने उसे वशीभूत कर लिया था। पद्मसिंह घर आते तो सदन के लिए अच्छे-अच्छे कपडे़ जूते लाते। सदन इन चीजो पर लहालोट हो जाता।

होली के दिन पद्मसिंह अवश्य घर आया करते थे। अबकी भी एक सप्ताह पहले उनका पत्र आया था कि हम आवेंगे। सदन रेशमी अचकन और वारनिशदार जूतो के स्वप्न देख रहा था। होली के एक दिन पहले मदनसिंह ने स्टेशन पर पालकी भेजी। प्रातकाल भी; सन्ध्या भी। दूसरे दिन भी दोनो जून सवारी गई, लेकिन वहाँ तो भोली बाई के मुजरे की ठहर चुकी थो, घर कौन आता। यह पहली ही होली थी कि पद्मसिंह घर नही आये। भामा रोने लगी। सदन के नैराश्य की तो कोई सीमा ही न थी, न कपड़े, न लत्ते, होलो कैसे खेले! मदनसिह भी मन मारे बैठे थे, एक उदासी सी छाई हुई थी। गाँव की रमणियाँ होली खेलने आई। भामा को उदास देखकर तसल्ली देने लगी, बहन, पराया कभी अपना नही होता। वहाँ दोनों जने शहर की वहार देखते होगे, गाँव में क्या करने आते। गाना बजाना हुआ, पर भामा का मन न लगा। मदनसिंह होली के दिन खूब भांग पिया करते थे। आज भांग छूई तक नही। सदन सारे दिन नंगे बदन मुंह लटकाये बैठा था। सन्ध्या को जाकर माँ से बोला, मै चचा के पास जाऊंगा।

भामा—वहाँ तेरा कौन बैठा हुआ है?

सदन—क्यो, चचा है नही?

भामा—अब वह चचा नही है। वहाँ कोई तुम्हारी बात भी न पूछेगा।

सदन--मै तो जाऊंगा।

भामा—एक बार कह दिया मुझे दिक मत करो, वहाँ जाने को मैं न कहूँगी ।

ज्यों ज्यों भामा मना करती थी सदन जिद पकड़ता था। अन्त में