पृष्ठ:सेवासदन.djvu/६०

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ प्रमाणित हो गया।
सेवासदन
६३
 


वह झुझलाकर वहाँ से उठ गई। सदन भी बाहर चला आया। जिद सामने को चोट नही सह सकती, उस पर बगली वार करना चाहिए।

सदन ने मन मे निश्चय किया कि चचा के पास भाग चलना चाहिए। न जाऊँ तो यह लोग कौन मुझे रेशमी अचकन बनवा देंगे। बहुत प्रसन्न होंगे तो एक नैनसुख का कुरता सिलवा देगे। एक मोहनमाला बनवाया है तो जानते होंगे जग जीत लिया। एक जोशन बनवाया है तो सारे गॉव में दिखाते फिरते है। मानो मैं जोशन पहनकर बैठूंगा। मैं तो जाऊँगा, देखूँ कौन रोकता है?

यह निश्चय करके वह अवसर ढूँढ़ने लगा। रात को जब सब लोग सो गये तो चुपके से उठकर घर से निकल खड़ा हुआ। स्टेशन वहॉ से तीन मील के लगभग था। चोथ का चाँद डूब चुका था, अँधेरा छाया हुआ था। गाँव के निकास पर बाँस की एक कोठी थी। सदन वहाँ पहुँचा तो कुछ चूँचूँ सी आवाज सुनाई दी। उसका कलेजा सन्न हो गया। लेकिन शीघ्र ही मालूम हो गया कि बाँस आपस मे रगड़ खा रहे है। जरा और आगे एक आम का पेड़ था। बहुत दिन हुए इसपर से एक कुर्मी का लड़का गिरकर मर गया था। सदन यहाँ पहुँचा तो उसे शंका हुई जैसे कोई खड़ा है। उसके रोगटे खड़े हो गये, सिर में चक्कर-सा आने लगा। लेकिन मन को सम्भाल कर जरा ध्यान से देखा तो कुछ न था। लपककर आगे बढ़ा। गाँव से बाहर निकल गया।

गाँव से दो मीलपर पीपल का एक वृक्ष था। यह जनश्रुति थी कि वहाँ भूतों का अड्डा है। सबके सब उसी वृक्ष पर रहते है। एक कमली वाला भूत उनका सरदार है। वह मुसाफिरो के सामने काली कमली ओढे खडाऊँ पहने आता है और हाथ फैलाकर कुछ माँगता है। मुसाफिर ज्योही देने लिए हाथ बढ़ाता है, वह अदृश्य हो जाता है। मालूम नही, क्रीड़ा से उसका क्या प्रयोजन था! रात को कोई मनुष्य उस रास्ते से अकेले न आता और जो कोई साहस करके चला जाता, वह कोई-न-कोई अलोकिक बात अवश्य देखता। कोई कहता गाना हो रहा था, कोई कहता