हिन्दी, उर्दू और हिन्दुस्तानी राधका को चैन क्या आवे कन्हैयाजी बग़ैर वाक़ई काक्रूर उड़ जावे अगर फिलफिल न हो । चमकते चाँद के हैं गिर्द जिस तरह तारे, अजब मजा है तेरे मुखड़े पर पसीने का ( पृष्ट ११६ ) ( पृष्ठ १४० ) साँवलेपन पर ग़ज़ब है वज बसन्ती शाल की, जी में है कह बैठिये अब 'जै कन्हैयालाल की। हैं वो जोगी नेहगिर अवधूत जिनके सामने, बालका देवे जनूँ वहशत परी है बालकी । क्यों न अङ्गारे उछाले फिर वो इंशा रात को, है हमारी आह शागिर्द श्रागया- बेताल की। ऐ अश्के गर्म कर मेरे दिल का इलाज कुछ, मशहूर है कि चोट को पानी से धारिये । य' कारखाना देखिये टुक आप ध्यान से, बस मौन खींच जाइये यहाँ दम न सारिये । नये धानों की सी खेती की तरह से इन्शा, seset और हरी हूँ तो भला तुझ को क्या । (पृष्ठ १६३) ( पृष्ठ २७० ) (पृष्ठ १७६) (पृष्ठ १८५५) सैकड़ों आँखें कन्हैया बन के गोता खा गईं, 'क्योंकर इन्शा नाक को तेरी न समझें ब्रह्मकुण्ड । इस पदमनी प' आँखों के भौंरों की भीड़ है, होगी किसी परी में न इस तनतने की बास | ( पृष्ठ १६४ ) (पृष्ठ १६६ )
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