१०० हिन्दी, उर्दू और हिन्दुस्तानी ៩ सूरदास ने विशुद्ध व्रजभाषा के साथ-साथ फ़ारसी शब्दों का भी अच्छा प्रयोग किया है।" ...कुछ फ़ारसी शब्द नीचे दिये जाते हैं, जिनका प्रयोग सूरसागर में हुआ है है । " वह शब्द यह है :- मसाइत नकीब असल साबिक जमा स्याहा मुसाहिब सही जवाब बरामद साफ़ गुजरान कैद वासिलबाकी लायक माफ़ मुजमिल जमा मुहासबा दामनगीर निशान मुहर्रिर नौबत दस्तक गरीब मुहकम मुस्तौफ़ी शोर फ़ौज बेहाल सुलतान दीवान निवाज़ इत्यादि । श्री सूरदास जी ब्रजभाषा के 'ग्रहले जवान' थे, अपने ठेठ तद्भव और तत्सम शब्दों की उनके पास कमी न थी । वह चाहते तो इन विदेशी शब्दों को अपनी कविता की वाटिका के पास न फटकने देते, पर वह तो परम उदार वैष्णव थे, शरणागत अङ्गीकृत का परित्याग कैसे करते ? तुलसीदास गई बहोरि गरीबनवाजू । सरल सबल साहिब रघुराजू ॥ नाम अनेक गरीबनवाजे । लोक वेद वर विरद विराजे ॥ लोकहू वेद सुसाहिब-रीती । विनय सुनत पहिचानत प्रीती ॥ गनी गरीब ग्राम नर नागर । पंडित मूढ मलीन उजागर ॥ समुझि सहमि मोहि अपडर अपने- 1 साहब सील निधान । दूरि फराक रुचिर सो घाटा । फ़राक = फ़राख, चौड़े । इत्यादि अनेक शब्द फारसी अरबी के तुलसीदास जी के समय हिन्दी में मिल गये थे । गोस्वामी जी ने ऐसे शब्दों का बहिष्कार नहीं किया उन्हें अंगीकार कर लिया। ऊपर के शब्दों में सुसाहिब - रीति पर है, इसमें अरबी 'साहिब' शब्द के साथ संस्कृत का 'सु' जोड़ा, 'रीति' के साथ उसका समास भी किया है । ध्यान देने योग्य उपसर्ग ही नहीं
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