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पृष्ठ:हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी.pdf/११९

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११२ हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी नहीं मिलती, वह दर्द है, जो उनके ( हाली के) कलाम में पाया जाता है । मौलाना (हाली) जब क़ौम के रूज व जवाल ( उत्थान - पतन) और मुसीबत - जदों (पदग्रस्तों) को बिपता बयान करने पर आते हैं, तो दुनिया का कोई शाइर उनका मुकाबिला नहीं कर सकता । 'हाल एक ऐसे शाइर हुए हैं, जिन्होंने उर्दू में कलाम में शीरीनी (मधुरता ) पैदा कर दी है ।" इस ज़माने में मौलवी हिंदी की चाशनी देकर मौलाना अब्दुल हक साहब की सम्मति की सचाई 'हाली' की 'बरखास्त' और 'मनाजाते बेवा' के आगे प्रकाशित, कतिपय पदों से साबित होती है । सुनरी सहेली मोरी पहेली, बाबल-घर में रही अलबेली । मात-पिता ने लाड़ से पाला, समझा मुझे सब घर का उजाला, एक बहन थी एक बहनेली ॥१॥ यों ही बहुत दिन गुड़िया मैं खेली, कभी अकेली कभी दुकेली । जिससे कहा चल तमाशा दिखा ला, उसने उठाकर गोद में ले ली ॥२॥ कुछ-कुछ मोहि समझ जो आई, एक जा ठहरी मोरी सगाई । आवन लागे बाम्हन नाई, कोई ले रुपय्या कोई ले घेली ॥३॥ ब्याह का मोरे समाँ जब आया, तेल चढ़ाया मँदा छवाया | सालू सूहा सभी पिन्हाया, महदी से रँग दिये हाथ-हथेली ||४| सासरे के लोग आये जो मोरे, ढोल दमाने बजे घनेरे । सुभ घड़ी सुभ दिन हुए जो फेरे, सैयाँ ने मोहे साथ में ले ली ||५|| आये बराती सब रस रंग के, लोग कुटम के सब हँस-हँस के । चावत थे सब घर से निकले, और के घर में जाय धकेली ॥६॥ लेके चले पी साथ जब अपने, रोवन लागे फिर सब अपने । कहा कि तू नहिं बस की अपने, जा बच्ची ! तेरा दाता है बेला ॥७॥ सखी ! पिया के साथ गई मैं, ऐसी गई फिर वहीं रही मैं । किससे कहूँ दुख हाथ दई ! मैं, सय्याँ ने मोरी बाँह गहेली ||८|| सास जो चाहे चाहे सोई सुनावे, ननद भी बैठी बात बनावे | क्या करूँ कुछ बन नहीं आवे, जैसी पड़ी मैं वैसी ही केली ॥६॥