हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी १११ जिया बियाकुल रोवत अँखियाँ कहाँ गई सब संग की सखियाँ । शौक रँग गुड़ियाँ ताक पै रखियाँ, ना वो घर है ना वो हवेली ||१०|| (जफर) यह दर्दभरी पहेली देहली के आखिरी बादशाह बहादुर शाह 'ज़फ़र' की कही हुई है; विवाह में लड़की के रुखसत होते वक्त गाई जाती है । इसमें बढ़ी सादगी और सफ़ाई से, सरल और सुन्दर भाषा में, एक ख़ास हालत का बयान किया है। नक्शा सा खींच दिया है, इससे उस वक्त की बोलचाल और रस्मोरिवाज का भी पता चलता है । नज़ीर की कविता और भाषा का नमूना बंजारानामा " टुक हिरसो हवा को छोड़ मियाँ मत देस बिदेस फिरे मारा, क़ज्जाक अजल का लूटे है दिन रात बजाकर नक्कारा | क्या बधिया भैंसा बैल शुतर क्या गौनें पल्ला सिरभारा, क्या गेहूँ चाँवल मोठ मटर क्या आग धुआँ क्या अंगारा । सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बञ्जारा ॥ जब चलते चलते रस्ते में ये गौन तेरी ढल जावेगी इक बधिया तेरी मिट्टी पर फिर घास न चरने पावेगी । ये खेप जो तू ने लादी है सब हिस्सों में बट जावेगी धी पूत जँवाई बेटा क्या बंजारिन पास न आवेगी । सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा ॥ जब मर्ग फिरा कर चाबुक को ये बैल बदन का हाँकेगा कोई नाज समेटेगा तेरा कोई गौन सिये और ढाँकेगा । हो ढेर अकेला जंगल में तू खाक लहद को फाँकेगा, इस जंगल में फिर आह 'नजीर' इक भुनगा आन न झाँकेगा । सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा ।। ' आदमीनामा 3 दुनिया में बादशा है सो है वो भी आदमी, और मुफलिसो गदा है सो है वो भी आदमी ; " 1
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