हिन्दी, उर्दू और हिन्दुस्तानी १२१ तद्भव है, न यह कि तत्सम । कारण इसका यह है कि बहुत से तद्भव शब्द ऐसे हैं, जो कि ज्यों के त्यों वैसे ही हैं, जैसे कि संस्कृत में हैं। जैसे- संस्कृत बर्न प्राकृत वर्ण तद्भव (ठेठ हिन्दी ) बन W यहाँ तत्सम शब्द भी वन ( या वन ) है, परन्तु बन भी अच्छा ठेठ हिन्दी शब्द है, क्योंकि वन केवल संस्कृत ही नहीं है, वरन् संस्कृत से प्राकृत में होकर आया हिन्दी शब्द है ! यह बिल्कुल साधारण बात है कि देवदत्त का पौत्र भी देवदत्त ही कहा जावे, और यही बात हिन्दी के विषय में भी कही जा सकती है । नीचे कुछ अन्य रूप भी दिये जाते हैं- तद्भव (ठेठ हिन्दी ) तत्सम संस्कृत प्राकृत जङ्गल: जंगलो जंगल जङ्गल या जंगल विलासः विलासो विलास विलास या बिलास सार: सारे सार सार एकः एक्को एक एक समरः समरौ समर समर गुणः गुणो गुन गुण (या गुन) इसी तरह से और भी बहुत से शब्द हैं । श्रतएव प्राकृत का जानना श्रावश्यक है, और मैं प्रत्येक मनुष्य को, जो कि हिन्दी की उन्नति करना चाहता है, यह सम्मति भी दूंगा कि वह प्राकृत का अध्ययन करे; क्योंकि वह हिन्दी की माता है । यदि श्राप जननी को जानते हैं, तो लड़की को अच्छी तरह समझ सकते है । माय गुन गाय पिता गुन घोड़। बहुत नहीं तो भोड़हि थोड़ || हिन्दी भाषा में श्राजकल संस्कृत शब्दों की जो बाढ़ या रही है - भाषा को जो ज़बरदस्ती संस्कृतमय बनाने का अनुचित उद्योग हो रहा है, इस सम्बन्ध
- श्रीहरिऔध जी लिखित 'बोलचाल ' की भूमिका पृष्ठ ५-१०