१२२ हिन्दी, उर्दू और हिन्दुस्तानी में संस्कृत के सुप्रसिद्ध विद्वान ( जयपुर राजकीय संस्कृत कालेज के प्रिन्सिपल) म० म० प० गिरधर शर्मा चतुर्वेदी ने अपने विचार इस प्रकार प्रकर किये हैं :- "आवश्यकतानुसार हिन्दी भाषा में संस्कृत शब्दों का प्रइस उपयोगी और लाभदायक है, किन्तु हिन्दी-भाषा को सर्वथा संस्कृत ही बना देना लाभ- दायक नहीं है। संस्कृत में एक नीतिवाक्य है 'अति सर्वत्र वर्जयेत्' अति कहीं नहीं करनी चाहिए, ऋति से अत्याचार होता है । लेखकों को सदा मध्य- • मार्ग का अवलम्बन करना चाहिये । दूसरे प्रान्तों में हिन्दी-प्रचार का जैसे "ध्यान रखना है, सब श्रेणी के लोगों को एक भाषा समझाने का भी उससे कम ध्यान नहीं रखना है । संस्कृतमय बनाकर अपने बंगाल, महाराष्ट्र श्रादि मैं हिन्दी का प्रचार शीघ्र कर लिया, किन्तु वह केवल शिक्षितों की भाषा बन गई, सर्वसाधारण उसे बिलकुल न समझ सके, तो क्या लाभ हुआ ? लाभ क्या, बड़ी हानि हो गई। देश की एक भाषा बनाने का उद्देश्य ही नष्ट हो गया । इससे भाषा ऐसी होनी चाहिये, जिसे साधारण जनता भी समझ सके । - साधारण बोलचाल की भाषा से चाहे प्रकृति के अनुसार उसमें भेद हो; किन्तु साधारण लोगों के समझने के योग्य तो रहे । तात्पर्य यह कि आजकल कुछ लेखक सज्जन जो 'बंगला' का आदर्श लेकर हिन्दी में प्रतिशतक ८०-६० शब्द संस्कृत के ठूंसकर उसे एकदम संस्कृत बना रहे हैं, यह प्रवृत्ति मेरी समझ में अच्छी नहीं। इससे हिन्दी का अपना भारडार लुप्त हो जायगा और लेख की भाषा साधारण भाषा से बहुत दूर चली जायगी । हिन्दी भाषा में हिन्दी भाषा के शब्द ही प्रथम लेने चाहिए। फिर जब उनसे आवश्यकता पूरी न हो, तब संस्कृत भाषा से सरल शब्द लेने चाहिएँ । किन्तु कई एक लेखक सज्जन तो आजकल हिन्दी में ऐसे अप्रसिद्ध शब्द और ऐसे विकट समासों का प्रयोग करते हैं जो आजकल संस्कृत भाषा में भी 'भयङ्कर' माने जाते हैं । 'विकच मल्लिका चढ़ाकर, ' ' स्वलक्ष्य शैलशृङ्ग पै', 'अनल्प कल्प कल्पना', 'जल प्रशांत रेणुकामय मार्ग', 'सहानुभूतिजनित हृदयममता', 'शुभ्रांगिनी सुपवना सुजला सुकूल, ' 'सत्पुष्प सौरभवती,' 'गिरिशृङ्गस्पर्द्धिनी', 'इन्द्रियों को उद्दाम प्रवृत्ति की सजीव क्रिया', 'संकुचित परिधि में आबद्ध', इत्यादि श्रप्रसिद्ध शब्द
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