हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी १२३ जैसा और जटिल समासों से लदे हुए वाक्य-खण्ड जो हिन्दी के प्रसिद्ध लेखकों की लेखनी से निकल रहे हैं, इनका समझना साधारण संस्कृत के लिए भी कठिन है । इस प्रकार हिन्दी की प्रकृति की रक्षा कैसे होगी ? हिन्दी की प्रकृति को तो सुरक्षित रखना है । इस समय तो संस्कृत को भी सरल बनाने का आन्दोलन है, वहाँ भी समासों पर आक्षेप होते हैं, फिर संस्कृत सरल बने, और हिन्दी कठिन बनती जाय ! यह विचित्र मार्ग है ! इसके अतिरिक्त इस प्रकार के जटिल शब्दों और वाक्यों को हठात् हिन्दी में खींचने वाले सज्जन बहुधा संस्कृत व्याकरण के नियमों का भी कायाकल्प करने पर उतारू हो रहे हैं, वे संस्कृत के अगाध समुद्र में तल तक डुबकी लगाकर नए-नए शब्द खोजकर लाते हैं, किन्तु उनसे अपने मनमाने महाविरों का काम लेते हैं, और संस्कृत व्याकरण के नियमों की भी बिलकुल पर्वाह नहीं करते । जब संस्कृत से शब्द लेना है, तब उन शब्दों की दो ही प्रक्रियाएँ हो सकती हैं या तो हिन्दी की प्रकृति के अनुकूल --- वैसे प्रत्यय लगाकर उन्हें बनाया जाय, कि प्राचीन कवि बहुधा करते रहे हैं, जैसे, 'सुन्दरता' संस्कृत का शब्द है, इसे हिन्दी में लेते समय 'सुन्दरताई' बना लिया, तो यह हिन्दी की प्रकृति अनुकूल हुआ । या फिर संस्कृत शब्दों को अपने ही शुद्ध रूप में लिया जाय, जैसे कि आजकल चाल है । इस दशा में वे संस्कृत में जैसे अर्थ में हैं, या उनके सम्बन्ध में संस्कृत व्याकरण के जैसे नियम हैं एवं वाक्य रचना की संस्कृत और हिन्दी की जैसी पद्धति है, उस सत्र की रक्षा आवश्यक होगी । यदि ये सब बातें न हुई, तो हिन्दी एक विलक्षण भाषा बन जायगी । बंगाली लेखकों ने कुछ संस्कृत शब्दों को मनमाने मुहावरों में बाँधा था, 'आप यह उपकार कर हमें चिरबाधित करेंगे,' इत्यादि, उनकी तो हँसी होती ही थी, इधर हिन्दी के लेखक सज्जन उनसे भी बहुत आगे बढ़ गये । उदाहरण- 'मीलित वर्ण, ' 'कविता के माध्यम शब्द हैं', इत्यादि मुद्दाविरे संस्कृत में कहीं प्राप्त नहीं होते, न इन संस्कृत शब्दों का इससे मिलते-जुलते अर्थ में ही प्रयोग प्राप्त है। हिन्दी में तो ऐसे शब्दों की गंध भी क्यों आने लगी, किन्तु हिन्दी के 'भाग्यविधाता' इनका प्रयोग करते हैं, फिर यह मनमानी नई भाषा गढ़ना नहीं तो क्या है ? 'इसके अतिरिक्त उसकी क्रिया भी कठोर होती है, ' | 41
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