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पृष्ठ:हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी.pdf/१४१

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१३४ हिन्दी, उर्दू और हिन्दुस्तानी (५) हिंदू मुसलमान के इत्तहाद ( ऐक ) की बुनियाद मजबूत होगी और हुवेवतन ( देशभक्ति ) के मैदान में ग्रासानी से दोनों कौमें एक साथ दौड़ेंगी ! इस नुक्ते पर पहुँचने के बाद हमको लाज़िम है कि हिंदुओं के सुन्दरजा बैल जखीरे पर नज़र डालें और उनसे जदीद तलमीहात हासिल करें :-- १ ---- रामायण, २ --- महाभारत, ३ --- हिंदू ग्रह दे - हकूमत ( शासनकाल ) की तारीख, ४ --- हिंदू अफ़साने - मसलन् शकुन्तला, नलदमन ( नल-दम- यन्ती ), विक्रमोर्वशी वगैरा, ५--- हिंदू देवमाला, ६--- हिंदू रसूम, ७-- -- हिंदू फिरकों के हालात व खयालात चाहते हैं जो हिंदू हम इस मौके पर ख़सूमियत के साथ उन तलमीहात का ज़िक्र करना वयात से ली जा सकती हैं और जिनसे हमारे अदबी- नई रूह पैदा हो सकती है, और जिनके हजाफ़ के बाद और प्रदव को दोनों कौमों का मुश्तरका सरमाया कह यात के कालिब में हम अपनी ज़बान सकते हैं । हिन्दी में शब्द प्रयोग की व्यवस्था हिन्दी एक ग्राम भाषा है । इसमें तो सन्देह का अवकाश ही नहीं क्योंकि उent उत्पत्ति संस्कृत और प्राकृत भाषा से हुई है, इसे सभी ने स्वीकार

  • आज तो उर्दू-फारसी के विद्वान् हिन्दू तलमीहात से इस

कदर नावाकिफ हैं कि जगजाहिर 'काशी' को बमानी 'इलाहाबाद' लिखते हैं । ( देखिये अहसन मारहरवी की फरहग दीवाने वली ) । इसी फरहंग में अर्जुन का परिचय इस प्रकार दिया गया है- " एक कदीम पहलवान जो बड़ा तीरन्दाज़ था । " - 'गुलशने-हिन्द' के ७ वें सफ़े पर कर्मनाशा (नदी) को "करम- नामसी की नहीं" लिखा है; खैर यहीं तक नहीं है, इस पर हजरत मौलाना शिबली साहब जैसे उर्दू फारसी के मुशी का नोट है-- "यानी इस नहीं से जिसका नाम करम था । " + मौलाना वहीदुद्दीन साहब 'सलीम' का "उर्दू", जनवरी सन् १६२२ में प्रकाशित "तलमीहात" शीर्षक लेख ।