亡 हिन्दी, उद, और हिन्दुस्तानी और हिरन, मुहल्ला और महल्ला, छिपना और छुपना, खिलाना, खुलाना और खलाना, ढाँकना, ढाँपना, थाँबना, थामना, चाकू, चाकू, लोन, नोन, दुगना, दूना, कभी, कधी, य, यू और या, वो, वह और वुह, उसको और उसकू, मिंह और मेंह, एसी और ऐसी, मैं, मैं और मीं में और मैं, कहीं और कहूँ, तुम और तम, हिलना और हलना, रलना और दलना, घिसना और बसना, लड़कई, लड़काई, लड़कापन, लड़कपन, पुर और पूर, मुहान, और मूहान, यहाँ औौर यहाँ, प्यारा और पियारा, मुद्रा और मरा, इत्यादि बहुत से शब्द, हैं, जिनमें उच्चारण-भेद या प्रान्तीयता का रूप भेद ही झगड़े का सब है । इन्शाअल्ला ने इन शब्दों के उदाहरण देकर उर्द या गैर उर्दू का फैसला किया है। इनमें से जिस शब्द का जो उच्चारण देहली में प्रचलित है (या था ), उसे सही या अहले-जवान की उर्दू माना है, बाक़ी को ग़लत उर्द या टकसाल बाहर की बोली कहा है। साहित्यिक वा परिष्कृत भाषा के लिये स्थान-विशेष की भाषा को आदर्श मानना पड़ता है, जिस प्रकार अँगरेजी भाषा के लिए पार्लमेंट की भाषा आदर्श मानी जाती है । इसी तरह उर्दू - कविता की भाषा का आदर्श देहली की जबान मानी गई । 1 पर भाषा का यह श्रादर्श - नियन्त्रण बोलचाल की भाषा के लिये ठीक और मुनासिब नहीं माना जा सकता । सय्यद इन्शा ने तो सारी देहली की भाषा को भी फ़सीह उर्द या 'उर्दू-ए-मुअल्ला' नहीं माना। 'उर्दू - ए मुअल्ला' या लाल किले के आस- पास की बस्ती - कुछ गिने-चुने मुहल्लों की, फिर उनमें भी कुछ खास लोगों की, जो देहली के क़दीम बाशिन्दे 'शरीफ़' और 'नजीब' -: ( जिनके माँ बाप दोनों देहली के पुराने बाशिन्दे ) है, उन्हीं की भाषा को उर्दू देहली में जो बाहर के लोग इधर-उधर से आकर बस गये हैं, १ को भ्रष्ट या टकसाल बाहर की जवान कहा है। बाहर वालों की माना है । उनकी भाषा बोली पर खूब फब्तियाँ उड़ाई हैं, सखन कड़ी चुटकियाँ ली है। देहली के गिने-चुने लोगों की - मात्रा को ही यदि उर्दू कहा जाय तब तो यह ठीक है--और इन्शा ने इसी दृष्टि से इस पर विचार किया है-पर उर्दू से यदि देश भाषा या 'हिन्दुस्तानी' मुराद ली जाय, जैसा कि वह है, तो इस संकुचित दृष्टि को छोड़ना पड़ेगा, क्योंकि भारत भर के सब उद् बोलने और लिखने वाले 'दिल्ली के रोड़े' नहीं बन
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