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पृष्ठ:हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी.pdf/१५३

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१४६ हिंदी, उर्दू और हिदुस्तानी इस रुक्के के लफ्ज़ 'डाली' और ग्रामों के नाम 'सुधारस' और 'रसना विलास' पर ज़रा ध्यान तो दीजिए। 'डाली' लफ्ज़ फ़ारसी का नहीं है, फिर भी औरगजेब जैसे ज़बरदस्त मुन्शी ने उसकी जगह श्ररबी या फ़ारसी लफ्ज़ गढ़कर या चुनकर नहीं रक्खा । जो बोलचाल में था, वही रहने दिया । आमों के नाम तो उन्होंने इस कमाल के रक्खे हैं कि क्या कोई रक्खेगा । 'सुधारस' और 'रसना विलास' क्या मीठे नाम हैं ! सुनते ही मुँह में पानी भर आता है। ये नाम बादशाह के भाषा-विज्ञान और सहृदयता के सच्चे साक्षी हैं । श्राम हिन्दुस्तान का मेवा है, फ़ारसी या तुर्की नाम उसके लिए मुना- सिब नहीं, यही समझ कर बादशाह ने यह रसीले भारतीय नाम तजवीज़ किए । जो लोग देशी चीज़ों के लिए भी विदेशी या विलायती नाम ढूँढ़ने में सारी लियाकत खर्च कर डालते है या वह लेखक, जो नई-नई परिभाषाएँ अपनी भाषा में लाने के लिए काहरा और कुस्तुन्तुनियाँ के अखबारों के फ़ाइल टटोलते रहते हैं, इससे शिक्षा ग्रहण करें तो भाषा पर बड़ी दया करें । औरङ्गजेब की पुत्री श्रीमती शाहजादी जेबुन्निसा वेगम ने जो फ़ारसी की कवि थी, हिन्दी में 'नैन- विलास' नामक कविताग्रन्थ की रचना की थी, जिसका अन्तिम दोहा यह बतलाया जाता है- - जबुन्निसा जहान में, दुख्तर आलमगीर । नेन विलास बिलास में, खास करी तहरीर ॥ बादशाह औरङ्गजेब के बड़े भाई शाहजादा दाराशिकोह का हिन्दू दर्शन- शास्त्र (फिलासफी) और उपनिषदों का प्रेम प्रसिद्ध ही है, वह तो इस पर चल- दान ही हो गये ! उर्दू के ही नहीं बल्कि पहले फ़ारसी के बड़े-बड़े मुसलमान कवियों ने हिन्दी में कविता की है । हिन्दुस्तानी या खड़ी बोली के आदिम कवि अमीर- सुसरो माने जाते हैं। उनकी हिन्दी कविता के जो थोड़े-बहुत नमूने पहेली और कहमुकरनी आदि के रूप में बच रहे हैं वही खड़ी बोली की कविता का सबसे पुराना नमूना समझा जाता है । बाद के भी अनेक मुसलमान विद्वानों ने हिन्दी में कविता की है, जिनमें मलिक मुहम्मद जायसी अब्दुर्रहीम खान- खाना ( 'रहीम' या 'रहमन' ) मुख्य हैं। रहीम संस्कृत के भी अच्छे कवि