१६ हिन्दी, उर्दू और हिन्दुस्तानी किया है । यहाँ 'हिन्दू' शब्द हिन्द के निवासी अर्थ का बोधक है, भारत की किसी जाति विशेष का नहीं। अब तक भी अमेरिका और फारस आदि देशों में हिन्दुस्तानी मात्र को (चाहे वह मुसलमान हो, हिन्दू या ईसाई ) 'हिन्दू' ही कहा जाता है। विचार करने पर इसमें किसी प्रकार के सन्देह का अवकाश नहीं रह जाता कि हमारी भाषा का सबसे पुराना, व्यापक और बहु व्यवहृत नाम 'हिन्दी' है, और मुसलमान लेखक ही — इस नाम के हिन्दी | निहार ओ-दिगर योम रोजस्त जानो, ४० | बहिन्दी जब धोस दिनरा पहचानो । शाना-यो-मश्वस्व दर हिन्दी जबाँ, कघा आमद पेश तो करदम बयाँ 1 नमक मलह है खोन शीरीं है मीठा, बहिन्दी जबाँ बेमज़ा हस्त सीठा । दोक तकला सूत बाशद रोसमा, 'जान रेसीदन बहिन्दी कावना | शमो - हया दर हिन्दी लाज, हासिल कहिये बाज्रखिराज ! दादन देना दाद दिया फेल का कर्जे-दामो-दैन दर हिन्दी उधार । पस बहिन्दी पम्बारा मी दाँ कपास, नत्र करगस बूम उल्लू बू-ए बास । इत्यादि ।
- शाह हातम अपने 'दीवानजादे' के दीवाचे ( भूमिका ) में
लिखते हैं- " मैंने तहरीर के लिये वह जबान अख्तियार की है, जो हिन्दुस्तान के तमाम सूबों की जबान है, यानी हिन्दवी, जिसे भाखा कहते हैं; क्योंकि इसे आम लोग बखूबी समझते हैं और बड़े तबके के लोग ( भद्रव्यक्ति ) भी पसन्द करते हैं। (फ्रेश विद्वान् गासी द वासी (Garein de Tassy) के पाँचवें भाषण से ) ।