२२ हिन्दी, उर्दू और हिन्दुस्तानो 'गालिब' के चन्द अशआर- रेख्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो गालिब, कहते हैं अगले जमाने में कोई 'मीर' भी था । जो य' कहे कि रेख्ता क्योंकि हो रश्के-फारसी, गुफ़्तए-ग़ालिब एक बार पढ़के उसे सुना कि यों तर्जे -बेदिल में रेख्ता कहना - असदुल्ला खाँ क़यामत है । 'कायम' के दो शेर---- 'कायम' मैं किया तौर-ग्रजल रेख्ता वरना - इक बात लचर-सी बज्र बाने - दकनी थी । 'कायम' ने रेख्ते को दिया खिलअते-क़बूल, वरना य' पेशे अहले- हुनर ( सुखन ) क्या कमाल था । जुरात कह राजल और इस अन्दाज की 'जरात' अब तू, रेख्ता जैसे कि अगली तेरी मशहूर हुई । 'मीर' और 'कायम' ने अपने पद्यों में रेख्ते की जन्म भूमि 'दकन' का नाम लेकर इस बात की ओर इशारा किया है कि 'रेख्ते' का प्रचार दक्खन से ही हुआ है, जैसा कि ऊपर ज़िक्र ना चुका है। * 'गुलशने-हिन्द' के लेखक मिर्ज़ा अली 'लुक' ने भी अपनी किताब में उर्दू के लिये जगह-जगह 'जबान -रेख्ता' ही लिखा है । वह किताब डा० जान गिलक्राइस्ट की आज्ञानुसार फ़ारसी 'गुलज़ार इब्राहीम' से तर्जुमा की गई थी । यद्यपि उस समय हिन्दुस्तानी शब्द का भी उर्दू के लिये प्रयोग हो चला था, मगर 'लुत्फ' ने लिखा है कि, "इन फारसी किताबों के हिन्दी-नसर करने से मुराद यह है..." इस प्रकार उन्होंने उर्दू-गद्य के लिये 'हिन्दी-नसर' शब्द भी इस्तेमाल किया है । ( 'गुलशने-हिन्द' )
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