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पृष्ठ:हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी.pdf/३६

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हिन्दी, उर्दू और हिन्दुस्तानी २६ में इसको दिया गया था, और जिस नाम से कि अक्सर बाशिन्दे इस मुल्क के अबतक इसको मौसूम करते हैं, इस नाम से ( हिन्दुस्तानी से ) ज्यादा मौजूँ हैं, जो अहले-यूरोप ने खितयार किया है । L 3 11 "अहले-यूरोप लफ़्ज़ हिन्दी से हिन्दुओं की बोली मुराद लेते हैं, जिसके लिये 'हिन्दवी' बिहतर है, और मुसलमानों की बोली के वास्ते 'हिन्दुस्तानी' का नाम क़रार दे लिया है। ख़ैर, यह जो कुछ भी हो, हिन्दुस्तान की इस जदीद ज़बान ( नई भाषा) की दो बड़ी और खास शाखें ब्रिटिश इंडिया के बड़े हिस्से में बोली जाती हैं और शुमाल (उत्तर -भारत) के मुसलमानों की ज़बान यानी हिन्दुस्तानी उर्दू ममालिक मगरबी-श्रो शुमाली (अब संयुक्त- प्रान्त या सूबा हिन्दुस्तान) की सरकार की जवान क़रार दी गई है, मर्चे हिन्दी भी उर्दू के साथ-साथ इसी तरह क़ायम है, जैसी की वह फ़ारसी के साथ थी । वाकया यह है, कि मुसलमान बादशाह हमेशा एक हिन्दी सेक्रेटरी, जो हिन्दी - नवीस कहलाता था, और फ़ारसी सेक्रेटरी, जिसको वह फ़ारसी-नवीस कहते थे, रखा करते थे, ताकि उनके अहकाम इन दोनों जवानों में लिखे जायें । इसी तरह ब्रिटिश गवर्नमेंट ममालिक- मग़रबी-ओ-शुमाली में हिन्दू आबादी के मफ़ाद (सुभीते ) लिये अकसर श्रौकात सरकारी क़वानीन (कानूनों) का उर्दू किताबों के साथ हिन्दी तर्जुमा भी देवनागरी हरूफ में देती है ।" खड़ी बोली ५ जिस प्रकार हिन्दी उर्दू को सम्मिलित रूप देने के लिये हिन्दुस्तानी नाम एक विशेष कारण से – हिन्दी उर्दू दोनों का एक शब्दद्वारा बोध कराने के लिये - पड़ा, इसी तरह ग्राम बोलचाल की भाषा के अर्थ में 'खड़ी बोली' नाम का प्रयोग भी चल पड़ा है। इसकी उत्पत्ति 'हिन्दुस्तानी' नाम के बाद हुई मालूम होती है । किसी प्राचीन ग्रन्थ में यह नाम नहीं पाया जाता । । हिन्दी कवि पहले ब्रजभाषा में ही कविता किया करते थे, चाहे वे भारत के किसी प्रान्त के निवासी हों। जब हिन्दी गद्य का प्रचार पर्याप्त रूप में हो गया, उसमें अनेक पत्र-पत्रिकायें निकलने लगीं, तब हिन्दी कविता की

  • रिसाला 'उर्दू' (त्रैमासिक), मास जूलाई, सन् १९२३ ई०