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पृष्ठ:हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी.pdf/४०

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हिन्दी, उर्दू और हिन्दुस्तानी ३श् इन्हीं के अक्षर का अर्थ देते हैं, वैसे ही नागरी वर्णमाला का सम्बन्ध नागर व नागरी भाषा के साथ दोनों प्रकार से अटल है, जैसे कि पाली के अक्षर 1 और भाषा दोनों का एक शब्द से बोध होता है । " नाम की ओर इशारा करता मालूम सभा के काशी नागरी प्रचारिणी सभा और 'नागरी प्रचारिणी पत्रिका' में प्रयुक्त 'नागरी' शब्द हिन्दी के इसी होता है, क्योंकि नागरी प्रचारिणी उद्देश में हिन्दी भाषा और नागरी लिपि इन दोनों ही का प्रचार सम्मिलित है, केवल नागरी लिपि का नहीं । आर्यभाषा - हिन्दी के अर्थ में 'आर्यभाषा' शब्द का प्रचार और व्यवहार करने वाले सम्प्रदाय में आर्यसमाज के प्रवर्तक श्री स्वामी दयानन्द सरस्वती जी प्रमुख हैं । उन्होंने अपनी पुस्तकों में हिन्दी की जगह सर्वत्र 'आर्यभाषा' शब्द का ही प्रयोग किया है। पुराने ख्याल के कट्टर श्रार्यसमाजी सज्जन श्राज भी इस शब्द के प्रचार के लिये तत्पर दिखाई देते हैं । गुरु- कुलों के अधिवेशनों के साथ जो भाषा सम्बन्धी परिषद् व सम्मेलन होते हैं, उनके नाम नागरी व हिन्दी सम्मेलन न होकर 'आर्यभाषा सम्मेलन' ही रक्खे जाते हैं । श्रार्यसमाजियों के अतिरिक्त भी कुछ लब्ध प्रतिष्ठ साहित्य- सेवी 'आर्यभाषा' नाम के समर्थक और पोषक रहे हैं, और हैं । भागलपुर के चतुर्थ हिन्दी - साहित्य सम्मेलन में उसके सभापति महात्मा मुन्शीराम जी ( बाद को स्वामी श्रद्धानन्द जी ) ने अपने भाषण में हिन्दी के स्थान में सर्वत्र 'आर्यभाषा' शब्द का ही प्रयोग किया है, और इस शब्द के प्रयोग के औचित्य में यह हेतु दिया है-- "मैंने कई बार " श्रार्यभाषा" शब्द का प्रयोग किया है। जिसे आप "हिन्दी" कहते हैं उसे मैं आर्यभाषा कहकर पुकारता हूँ। इसका मुख्य कारण तो यह है कि आपके ही एक पूर्व माननीय सभापति के कथनानुसार इस भाषा की बुनियाद उस समय पड़ चुकी थी, वरन् आर्यावर्त कहलाता था। फिर इस ही भाषा नहीं बनाना चाहते, प्रत्युत सारे है, जिसमें जैन, बौद्ध, मुसलमान, ईसाई ३ जब यह देश हिन्दुस्तान नहीं भाषा को हम केवल हिन्दुत्रों की देश की राष्ट्रभाषा बनाना चाहते सभी सम्मिलित है, इसलिये मैं