२४ हिन्दी, उर्दू और हिन्दुस्तानी इसे आर्यभाषा कह कर पुकारता हूँ ।" इस प्रकार श्रापने 'आर्यभाषा' शब्द का प्रयोग 'हिन्दुस्तानी' के अर्थ में किया है; 'आर्यभाषा' अर्थात् आर्यावर्त 'हिन्दुस्तान' की भाषा । इसके बाद, अगले वर्ष, हन्दी - साहित्य सम्मेलन के लखनऊ वाले पञ्चम अधिवेशन में भी हिन्दी के बजाय 'श्रयभाषा' शब्द के व्यवहार पर कुछ चर्चा चली थी । 'राष्ट्रभाषा' हिन्दी का नया नाम है, जो कभी विशेषण के रूप में और कभी विशेष्य के रूप में प्रयुक्त होता है । कभी 'राष्ट्रभाषा हिन्दी ' और कभी केवल 'राष्ट्रभाषा' शब्द से ही हिन्दी का बोध कराया जाता है । इस शब्द का जन्म और प्रचार विशेष रूप में राजनीतिक और साहित्यिक प्रगति के कारण हुआ है । यह बात सिद्ध रूप से मान ली गई है कि अपने व्यापक रूप और वाञ्छनीय गुणों के कारण हिन्दी ही देश की भाषा - राष्ट्रभाषा बन सकती है । इसी आधार पर हिन्दी का यह नया नामकरण हुआ है । हिन्दी- साहित्यसम्मेलन के अतिरिक्त हिन्दी की पत्र-पत्रिकायें भी इस नाम का विशेष रूप से प्रचार कर रही हैं । पिछले चौदह-पन्द्रह वर्षो से इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए कांग्रेस और प्रान्तीय राजनीतिक कान्फरेन्सों के साथ भी राष्ट्र-भाषा सम्मेलन हुआ करते हैं। यहाँ यह निवेदन कर देना भी आवश्यक प्रतीत होता है कि ऐसे सम्मेलन जहाँ हिन्दी-लिपि के प्रचार पर जर देते हैं, वहाँ भाषा को हिन्दुस्तानी बनाने का आदेश करते हैं । इसीलिये इन सम्मेलन में हिन्दू, मुसलमान, सिख, पारसी सभी लोग समान भाव से भाग लेते हैं । राजभाषा - कुछ विशेष विचारशील और दूरदर्शी विद्वानों की यह नई सूझ है कि हिन्दी या हिन्दुस्तानी भाषा, नाम या विशेषण के रूप में, भारत की भाषा की 'भावनी संज्ञा' राजभाषा हो सकती है— कभी आगे चल- कर वह 'राज-भाषा के नाम से पुकारी जा सकती है राष्ट्रभाषा नहीं हो सकती । इस मत का प्रतिपादन प्रयाग विश्वविद्यालय के हिन्दी - विभाग के ऋचतुर्थ हिन्दी-साहित्य सम्मेलन, भागलपुर का कार्य-विवरण, ग्राम प्रथम, पृष्ठ १५ ।
पृष्ठ:हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी.pdf/४१
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