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पृष्ठ:हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी.pdf/४४

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हिन्दी, उर्दू और हिन्दुस्तानी ३७ के उदाहरण में हज़रत याकूब, उदार दानियों में हातिमताई, न्यायकर्त्तानों में नौशेरवाँ दिल इत्यादि - - भारत में रहते भी उनकी दृष्टि इन दूर के विदेशी नामों पर ही पड़ती रही। उन्होंने यहाँ के भीम और अर्जुन, कोयल और मोर, गङ्गा और जमुना, हिमालय और विन्ध्याचल, कर्ण और विक्रम आदि अनेक का कभी भूलकर भी वर्णन नहीं किया । 1 उर्दू लेखकों की इस प्रवृत्ति ने उर्दू को एक नये विदेशी साँचे में ढाल कर हिन्दी से बलात् पृथक कर दिया । मज़हबी जोश ने भी भाषा के भेद को बढ़ाने में कुछ कम काम नहीं किया । यह लय बढ़ते-बढ़ते यहाँ तक बढ़ी कि उर्दू खालिस हिन्दुस्तान के मुसलमानों की मजहबी जुबान समझी जाने लगी । इसी तरह हिन्दी भाषा हिन्दुओं की । यही भावना एक दूसरे के वैर-विरोध और बहिष्कार का कारण बन गई। उर्दू के प्रायः मुसलमान लेखकों ने, और उनके अनुकरण में साइत परस्त हिन्दू लेखकों ने भी, जवान को 'उर्दू-ए-मुअल्ला' बनाने की धुन में उसके भण्डार से एक-एक हिन्दी - शब्द को बीन-बीन कर निकाल डाला और उनकी जगह कठिन, दुर्बोध और अप्रचलित अरबी, फ़ारसी और तुर्की शब्दों की भरमार कर दी । इसी प्रकार विशुद्ध हिन्दी के पक्षपातियों ने भाषा में व्यवहृत अनेक सरल और सुबोध प्रचलित उन फ़ारसी तद्भव और तत्सम शब्दों को भी, जिन्होंने हिन्दी का चोला धारण कर लिया था, अछूत समझ कर हिन्दी के मन्दिर से निकाल बाहर किया और उनके स्थान पर संस्कृत के भारी- भारी पोथाधारी पण्डिताऊ शब्दों को बिठा दिया | इस बारे में 'तारीखें- भाषा के इस 'कायाकल्प' के प्रसङ्ग में उस अधेड़ पति की हास्य- जनक दुर्गति का स्मरण हो आता है, जिसके एक वृद्धा और एक तरुणी दो घरवालियाँ थीं । वृद्धा उसे अपने समान पक्की उम्र का प्रकट करने के लिये फुरसत के वक्त में उसके सिर से काले बाल बीना करती, और इसी तरह युवती सफेद बाल चुनचुन कर निकाल डालती । दोनों की इस बदाबादी में कुछ दिनों के भीतर ही घरवाले बेचारे का हुलिया ही बदल गया -- दाढ़ी मूँछ और सिर के सारे बालों का सफाया होकर रह गया ।