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पृष्ठ:हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी.pdf/४५

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३८ हिन्दी, उर्दू और हिन्दुस्तानी नसर उर्दू' के विद्वान् लेखक, अलीगढ़ सुसलिम यूनिवर्सिटी के उर्दू लेक्चरर मौलाना 'ग्रहमन' मारहरवी ने कितने पते की और कैसे इन्साफ़ की बात कही है 66. www "साथ ही इसके यह सवाल भी लाज़िमन् करना चाहिये कि हिन्दुस्तान में सिर्फ़ कुलमान ही श्राबाद नहीं हैं, बल्कि उनसे बहुत पहले रिया ( श्रार्य) आवाद हो चुके हैं। अगर मुसलमान अपने साथ अरबी, फ़ारसी और तुर्की अलफ़ाज़ लाये हैं तो हमसाया अक्वाम ( पड़ोसी जातियों ) के पास भी संस्कृत और दूसरी प्राकृतें मौजूद हैं। उर्दू के जामा जेब जिस्म पर भारी-भारी लफ्ज़ों का बार ( भार ) डालना उसकी असली और फ़ितरी ( प्राकृतिक ) सूरत का बिगाड़ देना है । दस-बीस बरस से यह बबा-ए-आम फैली हुई है कि ख़ास कदो काविश ( जानबूझ कर प्रयत्न - पूर्वक) के साथ गैर-मुरविज तरकीबें ( अप्रचलित वाक्य विन्यास ) और नामूस (गैर मानूस ) अरची व फ़ारसी अलफाज का इस्तेमाल उर्दू इन्शा परदाजी ( लेखन कला ) का इम्तियाज़ी निशान ( विशेषतासूचक-चिह्न) समझा जाता है । मुसलमानों की इस हरकत ने हिन्दुनों को भी निचला बैठने नहीं दिया और अब वह भी अपने हलके-फुलके बयान को संस्कृत के भारी भरकम शब्दों से मिलाकर गुटुल करते जाते हैं । इसी जमन ( प्रसङ्ग ) में तीसरी रविशेतहरीर उन अँगरेज़ीस्त्राँ उर्दूदानों की है, जिनको यह मरज लाइक हो गया है ( रोग लग गया है ), कि उर्दू के एक लफ्ज. बाद जब तक चार लफ्ज़ अँगरेजी के न बोलें, सेहते ज़बान पर यकीन नहीं कर सकते ।" ( 'तारीख नसर उर्दू, मुकद्दमा, पृ०, २६- ३० ) के भाषा को दो भागों में विभक्त करने वाला यह व्यापक रोग या 'वना-ए- श्राम', जिसका उल्लेख मौ० श्रहसन ने ऊपर किया है, सिर्फ दस-बीस साल से ही नहीं बल्कि उससे बहुत पहले फैल चुका था, जिसका पता हज़ारों कोस दूर के विद्वानों को भी लग गया था । प्रसिद्ध फ्रेंच विद्वान् गासी द तासी ने अपने पाँचवें व्याख्यान ( सन् १८५४ ई० ) में इस भाषा भेद के सम्बन्ध में यह निष्कर्ष निकाला है :- "हिन्दुस्तान की यह जचान, जिसे खास तौर पर हिन्दुस्तान की जबान