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पृष्ठ:हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी.pdf/४८

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हिन्दी, उर्दू और हिन्दुस्तानी ४१ चालढाल, खाना और पहनना इन सब बातों का सलीका मुसलमानों से सीखा है, किसी बात में भी इनका कौल - फ़ेल ऐतवार के काबिल नहीं । उस जगद्गुरु हिन्दू जाति के विषय में, जिसने संसार को सबसे पहले सभ्यता का पाठ पढ़ाया और आचार व्यवहार सिखाकर मनुष्य बनाया, 'इन्शा' का यह फ़तवा कहाँ तक उचित है, इसका निर्णय इतिहासज्ञ विद्वान् ही कर सकते हैं । 'इन्शा' के इस उद्गार पर तो यही शेर सादिक़ आ रहा है चोट थी तेरी सुखन पर जा पड़ी इखलाक पर तू ने चाके पैरहन को ताजिगर पहुँचा दिया | खैर ! सय्यद गुलाम मुहीउद्दीन कादरी, एम० ए०, ('उर्दू के असालीक बयान' के लेखक ) के कथनानुसार "इन्शाअल्ला ख़ाँ उस दौर के इन्सान थे, जो उर्दू जबान का 'ग्रहदे - जाहिलिया' कहा जा सकता है;" पर आश्चर्य तो यह है कि इस रोशनी के जमाने में भी बड़े-बड़े रोशन-दिमाग़ कभी - कभी ऐसी बहकी बातें दोहराने में दरेश नहीं करते । नव्यात्र सदर यार जंग जनाब मौलाना हबीबुर्रहमान खाँ साहब शिरवानी ने लाहोर ओरियंटल कान्फरेन्स वाले अपने खुत-ए-सदारत ( सभापति के अभिभाषण, सन् १६२८ ई०) में गोस्वामी तुलसीदास जी के सम्बन्ध में, ग्रियर्सन साहब की इस प्रशंसात्मक सम्मति को अपने शब्दों में उद्धृत करके, कि "गौतम बुद्ध के बाद हिन्दुस्तान ने ऐसा सपूत पैदा नहीं किया । तौहीद (अद्वैत) और सेहते- नज़र (तत्त्वदर्शिनी दृष्टि) ने इसके ( तुलसीदास जी के) कलाम ( कविता ) को हकीकत का राज़दाँ (परमार्थ का रसज्ञ पारखी) बनाकर बकाए दवाम का खिलअत दिया (अमरता का पद प्रदान किया) 1" मौलाना साहब फ़रमाते हैं कि, “सवाल यह है कि यह तौहीद और सेहते-नज़र कहाँ सीखी ? जवाब वाक्रत्रात से सुनो, इसी अकबरी दरबार में ..... शिरवानी साहब के इस कथन का तो यही अभिप्राय है कि गोस्वामी तुलसीदास जी अकबरी दरबार के एक विद्यार्थी थे उन्होंने जो कुछ सीखा -~ अकबर के दरबार में, उनके आश्रय में, रहकर सीखा। अकबर के सुशासन का समय या उनका दरबार नसीब न होता तो वह राम चरित मानस की रचना भी न कर सकते, जिसने उन्हें अमर कर दिया है।