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पृष्ठ:हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी.pdf/५४

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हिन्दी, उर्दू और हिन्दुस्तानी I ४७ पण्डित ) नियुक्त तो इस बात के लिये हुये थे कि उत्तर भारत की सार्वजनिक बोली का एक ऐसा व्याकरण बनावें जो समान रूप से सब के काम का हो, पर उन्होंने दो व्याकरण गढ़ कर रख दिये । एक खालिस फ़ारसी अरबी का, दूसरा खालिस संस्कृत प्राकृत का । उर्दू के व्याकरण-निर्माता मौलवी संस्कृत से अनभिज्ञ थे और उन्होंने इस बात पर दृष्टि न दी कि हमारी भाषा की जड़ बुनियाद श्रार्यन ( Aryan - आर्य ) है । इसी तरह पण्डित सेमेटिक ( Semetic ) या सामी ( श्रनार्य ) भाषा के प्रभाव को सहन करने की शक्ति न रखते थे । यहाँ से वह 'उर्दू-ए-फ़ारसी' ( फ़ारसीमय उर्दू ) निकली जो सरकारी दफ्तरों में हैं, जिसको ग्राम आबादी नहीं समझ सकती है । उसी तरह "प्रेमसागर" की ख़ालिस हिन्दी सत्र को बोधगम्य नहीं है । एक तो कामियत ( भारतीयता ) से इस कदर छूछी है कि सब लोग उसे स्वीकार नहीं कर सकते । दूसरी बाल्योचित भोलेपन में उन घटनाओं से इनकार करती है जिनके असर से उर्दू एक जवान बन गई। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि देशी भाषा की पाठशालाओं का ऐसा व्याकरण बनने की जगह, जो फ़ारसी और नागरी दोनों लिपियों में बेखटके लिखा जाय... . हमारे यहाँ दो परक्षर विरोधी श्रेणियों की पुस्तकें हैं--एक मुसलमान और कायस्थों के लिये, दूसरी ब्राह्मण और बनियों के लिये ।" * राजा साहब दूसरी जगह लिखते हैं--- " नादान मौलवियों और पण्डित दोनों की यह बड़ी भूल है कि एक तो सिवाय क्रिया-पदों और कारक-चिन्हों के बाकी सब शब्द सही फ़ारसी अरबी के काम में लाना चाहते हैं, और दूसरे विशुद्ध पाणिनि की टकसाल की दली खरी-खरी संस्कृत | इसके मानी तो यह हैं कि यह जो हज़ारों बरस से हम लोग विभिन्न परिस्थितियों में पड़कर हजारों रद्दोबदल अपनी बोली में करते चले आये हैं, वह इनके रत्ती भर भी लिहाज़ के काबिल नहीं । बल्कि स्वाभाविक नियमों और परम्परा की भी इन्होंने कोई परवा न की । अति कठोर 'संस्कृत शब्दों को, जो हज़ारों बरस तक दाँत, होठ और जीभ

  • राजा साहब के उर्दू 'सरफ नहो' (उर्दू-व्याकरण) की अँगरेजी

भूमिका ।