५२ हिन्दी, उर्दू और हिन्दुस्तानी इस जदवल से इस्बज़ैल नतायज (परिणाम) बाज़ै तौर पर (स्पष्ट रूपसे) निकलते हैं-- i ( १ ) हिन्दी के अलफ़ाज़ हमारी ज़बान में तमाम जवानों से ज्यादा है, जो बमुकाविला कुल मजमूए के निस्क ( श्राधे ) के करीब हैं और अरबी के अलफ़ाज़ सेचन्द (तिगुने ) हैं । इससे साफ साबित होता है कि हमारी ज़बान की असली जमीन या बुनियाद हिन्दी है । पस जो हज़रात हमारी जबान को afeतान कर अरबी की तरफ़ ले जाना चाहते हैं, वह एक ऐसी गलती का इरतका करते हैं (ऐसी भूल करते हैं) जिससे इस ज़बान की फितरत ( प्रकृति) बिगड़ जायगी । ( २ ) हिन्दी अलफ़ाज़ के बाद दूसरा दर्जा उन अलफ़ाज़ का है जो गैर जबानों से हिन्दी के साथ मिल कर बने हैं। यह अलफ़ाज़ मजमूई अलफ़ाज़ के मुकाबले में करीब एक तिहाई के हैं। इससे बय्यन तौर पर साबित होता है ( स्पष्ट रूप से सिद्ध है) कि जवान में तौसी ( वृद्धि ) और तरक्की ( उन्नति ) का जो मैलान ( प्रवृत्ति- झुकाव ) है, उसका मंशा यह है कि हिन्दी के साथ गैर जबानों के अलफाज़ मिलाये जायें और इस तरीके से नये अलफ़ाज़ बनाये जायँ इस बिना ( श्राधार) पर जो लोग इस ज़बान की तरक्की के स्वाहाँ ( श्रमि- लाषी ) हैं, वह उसकी कुदरती रफ्तार ( स्वाभाविक गति ) को समझ कर हिन्दी के साथ गैर जवानों के अलफ़ाज़ मिलाकर जदीद (नवीन) अलफ़ाज़ बनायें | . (३) चूँकि दूसरी किस्म के अलफ़ाज़ हिन्दी और गैर जबानों के मिलाप से बनाये गये हैं, इसलिये साफ जाहिर है कि उनका शुमार हिन्दी अलफ़ाज़ में है । अब अगर यह अलफ़ाज़ और पहली किस्म के अलफ़ान . 'फरहंगे श्रसक्रिया' में जिन शब्दों को हिन्दी से पृथक् खालिस उर्दू शब्दों की तालिका में गिनाया गया है, जिनकी संख्या १७५०५ है, और जिनकी नारीफ़ में यह लिखा गया है कि वे गैर जवानों से हिन्दी के साथ मिल कर उर्दू में दाखिल हुए हैं, वे किस प्रकार के हैं- उनका स्वरूप क्या है-उसके दो चार नमूने यह है :-
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