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हिन्दी, उर्दू और हिन्दुस्तानी होती है । इस तादाद का मुकाबिला अरबी अलफ़ाज़ की तादाद से sarat और सुरयानी के अठारह अलफ़ाज़ मिलाकर करो [ यह दोनों ज़बानें भी अरबी की तरह सामी (Semetic) ज़बानें हैं ] अव सामी अल- फ़ाज़ की मजभूई तादाद ( कुल संख्या ) ७६०२ होती है, जो श्रारियाई अल- फ्राज़ के मुकाबिले में छठे हिस्से से भी कम हैं । गोया उर्दू ज़बान एक ऐसा मुरक्कम ( सम्मिश्रण ) है, जिसमें 'रियाई' और 'सामी' दोनों अन्सर (तत्व) शामिल हैं। मगर इन दोनों असरों की बाहमी निस्बत ( अनुपात ) ६ और १ की है। इस ग़ालिब अन्सर की बिना पर ( संख्याधिक्य के आधार पर) भी फ़ैसला हो जाता है कि हमारी जबान दर हकीकृत एक श्रारियाई जवान है ।" उर्दू में इल्मी इस्तलाहात (वैज्ञानिक परिभाषाएँ ) अब तक अरबी से ही ली जाती रही हैं और ली जाती हैं, जिनका विशुद्ध रूप अरवी होता है । अरबी की इन भारी-भारी परिभाषाओं ने भी उर्दू को हिन्दी से जुदा करने में काफ़ी हिस्सा लिया है। जो परिभाषाएँ संस्कृत और हिन्दी से आसानी से ली जा सकती हैं, उनकी जगह भी अरबी और तुर्की परिभाषाएँ ढूँढ-ढूँढ कर उर्दू में दाखिल करना उर्दू लेखक अनिवार्य - सा समझते हैं । उर्दू लेखकों की इस प्रवृत्ति को मौलाना अब्दुलहक साहब ने प्रकारान्तर से उचित बताया है । वह कहते हैं :- 66 1 अलबत्ता इस्तलादात अरबी से ली गई हैं, क्योंकि इससे गुरेज नहीं । उर्दू जुबान में तकरीबन ( लगभग ) कुल इल्मी इस्तलाहात रवी ही से लेनी पड़ती हैं, जैसे अँग्रेज़ी जबान में लातीनी और यूनानी से । ** 'वज़ै इस्तलाहात' के विद्वान् लेखक ने अपनी पाण्डित्यपूर्ण पुस्तक में परिभाषा निर्माण के सिद्धान्त पर बहुत विस्तृत बहस की है। जो लोग केवल अरबी से ही उर्दू में परिभाषा लेने के पक्षपाती हैं, उनके भ्रान्त मत का निराकरण इस प्रकार किया हैं । सलीम साहेब लिखते हैं--- પ .... मगर जो हज़रात वज़ै इस्तलादात ( परिभाषा - निर्माण )
- 'वजे इस्तलाहात' पृष्ठ- १५५-५८ ।
'क्रवायदे - उर्दू' का मुक़दमा (भूमिका), पृष्ठ १६ ।