हिन्दी, उर्दू और हिन्दुस्तानी ६१ को ललित किशोरी (साह कुन्दनलालजी, जिनका मृत्यु- सम्वत् १६३० वि० है ), भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, पं० प्रतापनारायण मिश्र, पं० बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन', बाबू बालमुकुन्दगुप्त, पं० नाथूरामशङ्कर शर्मा 'शङ्कर', पं० नारायण- प्रसाद 'बेताब', पं० अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध', लाला भगवानदीन 'दीन', पं० गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही', इत्यादि प्रमुख हिन्दी कवियों ने उर्दू बहर में भी अच्छी कविता की है, मगर मुसलमान उर्दू कवियों ने हिन्दी पिङ्गल के मैदान में कदम नहीं रक्खा - वर्तमान काल के किसी भी मुसलमान कवि ने हिन्दी पिङ्गल को नहीं अपनाया, यद्यपि अरवी अरून की अपेक्षा... हिन्दी का पिङ्गल सरल, सुबोध और हमारी भाषा के सर्वथा अनुकूल है । दोनों भाषाओं के बीच पिङ्गल-भेद की यह भीत 'दीवारे कहकहा', बनी खड़ी है, जो उर्दू-हिन्दी को मिलने नहीं देती । . पण्डित अयोध्यासिंह उपाध्याय ने अपनी 'बोलचाल' की भूमिका में हिन्दी पिङ्गल और उर्दू अरूज पर विस्तार से बहस की है। दोनों के गुण-दोष का सरलता और कठिनता का, उपादेयता और अनुपादेयता का, तुलनात्मक दन से अच्छा वर्णन किया है । उपाध्याय जी ने उस बहस के शेष वक्तव्य में जो निष्कर्ष निकाला है, वह यह है :- "विचारणीय विषय यह था कि उर्दू बहरों के नियम यदि पिङ्गल के 'छन्दोनियम से सरल, सुबोध और उपयोगी होवें तो वे क्यों न ग्रहण किये जावें । इस विषय की अब तक जो मीमांसा की गई है उससे यह स्पष्ट हो गया कि ( पिङ्गल के ) छन्दोनियम उर्दू बहरों के नियम से कहीं सरल और सुबोध अथच उपयोगी हैं। जितनी ही उर्दू बहर के नियमों में जटिलता है उतनी ही छन्दोनियमों में सुबोधता और सरलता है । यदि बहरों के नियम बीहड़ों के पेचीले मार्ग हैं तो छन्दोनियम राजपथ (शाही- सड़क) हैं। मैंने उर्दू बहर के नियमों की जाँच पिङ्गल नियमों के अनुसार की है और दोनों का मिलान भी किया है, उनका गुण दोष भी दिखलाया है । अतएव तर्क का स्थान शेष नहीं है । तथापि यह कहा जा सकता है कि उर्दू बहरों को उर्दू नियमों की कसौटी पर कसना चाहिये और उसी
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