हिन्दी, उर्दू और हिन्दुस्तानी ७१ ), सही ( ४ ), मसाला (Nashi ) ...... यह भी नुमायाँ है । वह लफ़्ज़ यह हैं :- कुसाई ( ( ftware ) सफ़ील ( ) खैर सल्ला कोई करीना है कि तलफ्फुज तो एक आवाज़ में और नुमायश हो उसकी स्वार चार सूरतों में । सलफ्फुज के मैदान में यह कोतल घोड़े किस काम आ सकते हैं ? .......फिर एक ऐन (१) अब्द () में और शकूल का है, बाद (2) में और वज़े का और नजा ( ) में और सूरत का, हाँलाकि देवनागरी को इस शुतर गुरबगी (ऊँट बिल्ली के गठजोड़े) की हवा भी नहीं लगी । " हमावाज़ हरूफ़ का ( जिनका उच्चारण एकसा है) इख़राज बज़ाहिर एक बड़ा मामला मालूम होता है, मगर जब कि इन अशकालो हरूक ( अक्षरों की आकृति ) पर न इसलाम का दारोमदार है न मुसलमानों की कौमियत का इनहिसार ( आधार ), तो यह चन्दाँ पसोपेश का मामला मालूम नहीं होता । खुसूसन ऐसी सूरत में कि एक यकीनी और नकद फायदा भी नजर आता है । "इन हरूफ का सबसे बड़ा फायदा मौजूदा हालत में यह कहा जा सकता है कि हरफ़ लफ्ज़ अपना शजर - ए - निसबत ( वंशावली ) साथ रखता है, और फ़ौरन मालूम हो जाता है कि इस लफ्ज़ का माद्दा क्या है और किस लफ्ज़ से मश्तक हुआ है-किस शब्द से बना है जिससे हम इस लफ्ज़ की इमला में गलती नहीं करते। लेकिन जब तमाम हमावान् हरूफ खारिज होकर सब की जगह सिर्फ़ एक ही हरफ रह जायगा तो ग़लती का इमकान व एहतमाल भी न रह जायगा । लिहाजा यह फायदा महत्र 'कोह कन्दन व काह बरा उर्दन' ( खोदा पहाड़ निकला कहा जाय कि जिस तरह अब अब्दुल अज़ीम ( समझ में आते हैं, इस तरह अब्दुल अज़ीम ( समझ में न आ सकेंगे। मगर यह भी कुछ बात नहीं है । रोटी, टुकड़ा, काग़ज़ दवात, सुफ़ेद, सुर्ख वगैरा सदहा ( सैकड़ों ) अलफ़ाज़ के मानी समझ में नहीं आते, उस वक्त नामों के मानी समझने की क्या जरूरत पेश आयगी ? अब भी हजारों लफ्ज़ हैं, जिनकी शक्ल उर्दू लिबास में नहीं चूहा ) है । अगर यह ) के माने 1 ) के माने
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