हिन्दी, उर्दू और हिन्दुस्तानी बस कि था नाम-ए- ऐमाल मेरा हिन्दी में, कोई पढ़ ही न सका मिल कई फिलफौर नजात । 'Excer' area हिन्दी और नागरी से अपरिचित थे । इसी वजह से उन्होंने हिन्दी के बारे में ज़राफ़त के पैराये में ऐसा ख़याल ज़ाहिर फ़रमाया है । वर्ना इन्साफ़ से देखा जाय तो यह बात फ़ारसी उर्दू के हक़ में कही जा सकती है-उसी पर चस्पाँ होती है । sarat फ़ारसी लिपि सिर्फ भारतीय भाषाओं ही के लिये श्रनुपयुक्त नहीं है, टर्की और फ़ारिस वाले भी इससे तंग हैं, वहाँ भी इसके विरुद्ध श्रान्दोलन हो रहा है, टर्की में तो अरबी लिपि की जगह रोमन अक्षरों का रिवाज हो ही गया है, फ़ारिस में भी इसके विरुद्ध चर्चा चल रही है । ईरान के प्रिन्स मिज मलकम खाँ नाजिमुद्दौला ने 'कुल्लियाते मलकम' जिल्द अम्बल में फ़ारसी लिपि के विरुद्ध चौबीस दलीलें दी हैं, और
- एक बार जब मैं 'अकबर' साहब से मिलने उनके मकान इशरत
मंजिल में गया तो मौलाना मीर गुलाम अली साहब आजाद बिल- मामा की फ़ारसी किताब 'सर्वेचाजाद दिखाकर बोले कि 'फ़ारसी कलाम के साथ इनमें कुछ हिन्दी कलाम भी है जो सही पढ़ा नहीं जाता, समझ में नहीं आता, इसमें से कुछ हिन्दी कलाम सुनाइये तो" । मैंने सैयद गुलाम नबी 'रसलीन' की हिन्दी कविता हिन्दी में पढ़ी थी, जो 'सर्वेआजाद' में भी दी हुई थी, इसलिये मैं उसे किसी तरह पढ़ सका और उसका मतलब भी उर्दू में समझाया । सुनकर बहुत खुश हुये और कहने लगे-- "आज हिन्दू-मुसलमान हिन्दी उर्दू के लिए भी लड़ते है, दूसरी बातों के सिवा जबान का सवाल भी लड़ाई का सबब बन रहा है । देखिये, यह पहिले मुसलमान शाइर अरबी-फारसी के आला दर्जे के शाइर होने के बावजूद हिन्दी में भी कैसी अच्छी शाइरी करते थे। काश मुझे भी हिन्दी आदी होती तो मैं भी हिन्दी में कुछ. लिखता ।" ६