पृष्ठ:हिंदी भाषा और उसके साहित्य का विकास.djvu/११८

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कर लिया है, और आज कल इनका प्रचार इसी रूप में है। बहुत से सामान पाश्चात्य देशों से भारत वर्ष में ऐसे आ रहे हैं, जिनका हिन्दी नाम है ही नहीं ऐसी अवस्था में उनका योरोपियन अथवा अमरीकन नाम ही प्रचलित हो जाता है। और इस प्रकार उन देशों की भाषा के अनेक शब्द इस समय हिन्दी भाषा में मिलते जा रहे हैं। यह स्वाभाविकता है, विजयी जाति के अनेक शब्द विजित जाति के भाषा में मिल जाते ही हैं, क्यों कि परिस्थिति ऐसा कराती रहती है। किन्तु इससे चिन्तित न होना चाहिये। इससे भाषा पुष्ट और व्यापक होगी, और उसमें अनेक उपयोगी विचार संचित हो जावेंगे। यत्न इस बात का होना चाहिये, कि भाषा विजातीय शब्दों, वाक्यों और भावों को इस प्रकार ग्रहण करे कि उसकी विजातीयता हमारी जातीयता के रंग में निमग्न हो जावे।

आज कल कुछ शब्द अन्य प्रान्तों के भी हिन्दी भाषा में गृहीत हो गये हैं। कुछ विचारमान पुरुष इसको अच्छा नहीं समझते, वे सोचते हैं, इससे अपनी भाषा का दारिद्रय सूचित होता है। मैं कहता हूं इस बिचार में गंभीरता नहीं है। प्रथम तो हिन्दी भाषा राष्ट्रीय पद पर आरूढ़ हो रही है, इस लिये राष्ट्र की सम्पत्ति उसी की है। दूसरी बात यह है कि राष्ट्रोपयोगी जो व्यापक शब्द हैं, अथवा जो कारण विशेष से ऐसे बन गये हैं, जो भावद्योतन में किसी हिन्दी शब्द से विशेष क्षमतावान हैं, तो वे क्यों न ग्रहण कर लिये जावें। यदि विदेशीय शब्दों का कुछ स्वत्व हिन्दी भाषा पर विशेष कारणों से है, तो ऐसे शब्दों का क्यों नहीं। मेरा विचार है कि उनका तो सादर अभिनन्दन करना चाहिये। इस प्रकार के शब्द मराठी के लागू, चालू आदि, गुजराती के हड़ताल आदि, बँगला के गल्प, प्राणपण आदि ओर तामिल भाषा के चुरुत आदि हैं। जब ये शब्द प्रचलित हो गये हैं, और सर्व साधारण के बोधगम्य हैं, तो इन के स्थान पर न तो दूसरा शब्द गढ़ने का उद्योग करना चाहिये और न इनका बायकाट। इस प्रकार का सम्मिलन भाषा विकास का साधक है, बाधक नहीं यदि वह सीमित और मर्यादित हो।