पृष्ठ:हिंदी भाषा और उसके साहित्य का विकास.djvu/४४

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ज्योति दान करनेवाली बिजली आर्यजाति की प्राचीन और आदिम भाषा संस्कृत है" २

तीसरा प्रकरण।

अन्य प्राकृत भाषायें और हिन्दी

मैं पहले लिख आया हूं, मूल प्राकृत अथवा आर्ष प्राकृत का अन्यतम रूप पाली है, अतएव सबसे प्राचीन अथवा पहली प्राकृत पाली कही जा सकती है। आर्ष प्राकृत में उल्लेख योग्य कोई साहित्य नहीं है, कारण इसका यह है कि आर्षप्राकृत, परिवर्तनशील वैदिक भाषा के उस आदिम रूप का नाम है, जब उसमें देशज शब्दों का मिश्रण आरम्भ हो गया था, उसके शब्द टूटने फूटने लग गये थे और उनका अन्यथा व्यवहार होने लगा था। काल पाकर यह विकृति दृष्टि देने योग्य हो गई, और इतनी बढ़ गई, कि भिन्न रूपमें प्रकट हुई। उस समय उसका नाम पाली पड़ा। यथा समय यह पाली साहित्य की भाषा भी बनी, और उसका व्याकरण भी तैयार हुआ। कुछ काल तक अनेक विद्वानों का यह विचार था कि गाथा से पाली की उत्पत्ति हुई। और इस गाथा की भाषा ही आर्ष प्राकृत है। परन्तु आजकल यह विचार नहीं माना जाता है। यदि गाथा को वैदिक भाषा और पाली की मध्यवर्तिनी मान लें, तो आर्ष प्राकृत में भी साहित्यका

2. The languages as have been very beautifully described by Max Muller, floated about "like islands oa the ocean of human speech, they did not shoot together to form themselves into larger continent. This is the most critical period in the history of every science, and if it had not been for a happy accident, which like an electric spark caused the floating elements to crystalize into a regular form it is more than doubtful whether the long list of languages and dialec's enumarated and described in the work of Harnes and Adelung could long have sustained the interest of the students of languages. The electric spark was the discovery of Sanskrit the ancient language of the Hindus".