पृष्ठ:हिंदी भाषा और उसके साहित्य का विकास.djvu/४७

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"मृच्छ कटिक नाटक में शकार का अधिकतर कथन विशुद्ध प्राकृत मागधी में रचित है। प्राकृत मागधी का मूल शौरसेनी है, इसलिये उसमें शौरसेनो तो मिलती ही है, स्थान स्थान पर महाराष्ट्री के शब्द भी देखे जाते हैं। इसीलिये कहीं कहीं शकार की भाषा को अर्द्धमागधी कहा गया है। अभिज्ञानशाकुन्तल में रक्षिपुरुष और धीवर की भाषा प्राकृत मागधी है। वेणीसंहार नाटक और उदात्तराघव के राक्षस को भाषा भी प्राकृत मागधी है। मुद्राराक्षस आदि में भी इसका व्यवहार देखा जाता है। किन्तु प्रायः इसके साथ भिन्न जातीय प्राकृत का सम्मिलन पाया जाता है”।

इन सब बातों को लिखकर पालिप्रकाशकार १८ पृष्ट में यह लिखते हैं-

"जो कुछ कहा गया उसको पढ़कर हृदय में स्वभावतः यह प्रश्न उदय होता है, कि 'मागधी, नाम से प्रसिद्ध होकर भी पाली, (वौद्धमागधी), एवं प्राकृतमागधी में परस्पर इतना भेद क्यों है ? ए एकही स्थान की भाषायें हैं, यह बात इनका साधारण नाम ही स्पष्ट भाव से बतलाता है । तो क्या ए दोनों भाषायें, विभिन्न प्रदेश की हैं ? अथवा दोनों के मध्य में दीर्घकाल का व्यवधान होनेके कारण एकही अन्य रूप में परिवर्तित हो गई है। या विस्तृत मगध प्रदेश के अंश विशेष में एक, और अन्य विभाग में दूसरी प्रचलित थी ? इनका परस्पर सम्बन्ध क्या है ?

इन प्रश्नों का उत्तर ६६ पृष्ट में वे यह देते हैं ...

"पहले हमने वौद्धमागधी, और प्राकृतमागधी के स्थान और काल के सम्बन्ध में प्रश्न उठाया था। यह प्रश्न पाठकों के निकट इसी रूप में रहा । विषय इतना गुरुतर है, कि इस सम्बन्ध में मैंने जो अनुसन्धान किया है, वह इस समय प्रकाश योग्य नहीं है । समयान्तर में में इसका उत्तर देने की चेष्टा करूंगा"

कम से कम इन पंक्तियों को पढ़ कर यह तो स्पष्ट हो गया, कि मागधी दो प्रकार की है, और उनमें परस्पर बहुत बड़ा अन्तर है । इन पंक्तियों. द्वारा यह भी विदित होता है, कि बौद्धमागधी ही पाली है, और बुद्धदेव ने