पृष्ठ:हिंदी भाषा और उसके साहित्य का विकास.djvu/६६

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मुश्क काफूरस्त कस्तूरी कपूर ।
हिन्दवी आनन्द शादी औसरूर ।
सोज़नो रिश्ता ब हिंदी सूई ताग।

इसका अर्थ हुआ मुश्क को कस्तूरी, काफूर को कपूर, शादी और सरूर को आनन्द, एवं सोज़न और रिश्ताको हिन्दी में सूई तागा कहते हैं।

अपनी हिन्दी रचना में एक जगह वे यह कहते हैं-

फारसी बोली आईना । तुर्की ढूंढी पाईना।
हिन्दी बोली आरसी आए । खुसरो कहे कोई न बताये।

इसका अर्थ हुआ फ़ारसी में जिसे आईना कहते हैं, हिन्दी में उसको आरसी। मालिक मुहम्मद जाईसी भी हिन्दी को हिन्दवी ही कहते हैं---

तुरकी अरबी हिन्दवी भाषा जेती आहि ।
जामें मारग प्रेम का सबै सराहै ताहि ।

इन पद्यों से यह स्पष्ट हो गया कि अब से छः सात सौ बरस पहले से हमारे मध्यवर्ती देश की भाषा हिन्दी कहलाती है। परन्तु यह अवश्य है कि हिन्दुओं में यह नाम बहुत पीछे गृहीत हुआ है, जैसा मैं ऊपर लिख आया हूं। पहले हिन्दवी अथवा हिन्दुई को अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता था । हिन्दुई शब्द गँवारी बोलचाल अथवा साधारण कोटि की भाषा के लिये प्रयुक्त होता था। इसीलिये उच्च हिन्दी अथवा उसकी साहित्यिक रचनाओ का नाम भाषा था। परन्तु जब यह भापा बहुत व्यापक हुई, और उसमें अनेक अच्छे अच्छे ग्रन्थ निर्मित हुए, सुदूर प्रान्तों से सुन्दर सुन्दर समाचार-पत्र निकले तब बिचार बदला और उस समय से हिन्दी भाषा कहकर ही उसका परिचय दिया जाने लगा। आज दिन तो हिन्दी अपने नाम के अर्थानुसार वास्तव में हिन्द की भाषा बन रही है।