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भी 'स' का प्रयोग पाया जाता है—जैसे राजस्थानी (जयपुरी) करसी, पश्चिमी पंजाबी 'करेसी' इत्यादि । इसी प्रकार संख्यावाचकों में 'स' का 'ह' प्रायः सभी मध्यकालीन तथा आधुनिक आर्यभाषाओं में पाया जाता है। जैसे पश्चिमी हिन्दी में 'ग्यारह' 'बारह' चौहत्तर इत्यादि"।[१]
अंतरंग वहिरंग भेद के संयोगावस्था के प्रत्ययों और वियोगावस्था के स्वतंत्र शब्दों के भेद की कल्पना भी दुर्बल है। अंतरंग मानी गई पश्चिमी हिन्दी तथा अन्य सभी आधुनिकभाषाओं में संयोगावस्थापन्नरूपों का आभास मिलता है। यह दूसरी बात है कि किसी में कोई रूप सुरक्षित है किसी में कोई। पश्चिमी हिन्दी और अन्य आधुनिक आर्यभाषाओं की रूपावली में स्पष्टतः हम यही भेद पाते हैं कि उसमें कारक चिन्हों के पूर्व विकारी रूपही आते हैं। जैसे—'घोड़े का' में 'घोड़े'। यह घोड़े, घोड़हि घोटस्य अथवा घोटक+तृतीया बहुवचन बिभक्ति, 'हि'—भिः) से निकला है। यह बिकारी रूप संयोगावस्थ। पन्न होकर भी अन्तरंग मानी गई भाषाका है। इसके विपरीत बहिरंग मानीगई बैंगला का घोड़ार, और विहारी का 'घोराक' रूप संयोगावस्थापन्न नहीं, किन्तु घोटक+कर और घोड़ार क-क्क से घिस घिसाकर बना हुआ सम्मिश्रण है। पुनश्च अंतरंग मानी हुई जिस पश्चिमी हिन्दी में वियोगावस्थापन्न रूप ही मिलने चाहियें, कारकों का बोध स्वतंत्र सहायक शब्दों के द्वारा होना चाहिये, उसी में प्रायः सभी कारकों में ऐसे रूप पाये जाते हैं जो नितान्त संयोगावस्थापन्न हैं। अतएव वे बिना किसी सहायक शब्द के प्रयुक्त होते हैं।
उदाहरण लीजिये—
- ↑ देखो 'हिन्दी भाषा और साहित्य' पृष्ठ ३२।