पृष्ठ:हिंदी व्याकरण.pdf/२०८

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"की लिखते हैं, जैसे, "आपकी आज्ञानुसार यह वर माँगता हूँ।" (सत्य॰)। अनुरूप और अनुकूल प्राय समानार्थी हैं।

सदृश, समान, तुल्य, योग्य—ये शब्द विशेषण हैं और संबंधसूचक के समान आकर भी संज्ञा की विशेषता बतलाते हैं, जैसे, "मुकुट के योग्य सिर पर तृण क्यों रक्खा है।" (सत्य॰)। "यह रेखा उस रेखा के तुल्य है।" "मेरी दशा ऐसे ही वृक्षों के सदृश हो रही है।" (रघु॰)।

सरीखा—इसके लिंग और बचन विशेष्य के अनुसार बदलते हैं और इसके पूर्व बहुधा विभक्ति नहीं आती, जैसे, "मुझ सरीखे लोग।" (सत्य॰)। यह "सदृश" आदि का पर्यायवाची है और पूर्व शब्द के साथ मिलकर विशेषण का काम देता है। (अ॰—१६०)।

ऐसा, जैसा, सा—ये "सरीखा" के पर्यायवाची हैं। आजकल "सरीखा" के बदले "जैसा" का प्रचार बढ़ रहा है। "सरीखा' के समान "जैसा", "ऐसा" और "सा" का रूप विशेष्य के लिंग और वचन के अनुसार बदल जाता है। इनका प्रयोग भी विशेषण और संबंधसूचक, दोनों के समान होता है।

ऐसा—इसका प्रयोग बहुधा सजा के विकृत रूप के साथ होता है। (अं॰—२३२-ख)। 'ऐसा' का प्रचार पहले की अपेक्षा कुछ कम है। भारतेंदुजी के समय की पुस्तकों में इसके उदाहरण मिलते हैं, जैसे, "प्राचार्य जी पागल ऐसे हो गये हैं।" (सरो॰)। "विशेष करके आप ऐसे।" (सत्य॰)। "काश्मीर ऐसे एक-आद इलाके का।" (इति॰)। कोई कोई इसका एक प्रांतिक रूप "कैसा" लिखते हैं, जैसे, "अग्नि कैसी लाल लाल जीभ निकाल।" (प्रणयि॰)।

जैसा—इसका प्रचार आज कल के ग्रथों में अधिकता से होता