पृष्ठ:हिंदी शब्दसागर भाग ५.pdf/५८८

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रक्तगैरिक २८७९ रक्तपिट गर्भ गिर जाने से होता है। कभी कभी यह प्रसव के उप- रक्तदूषण-वि० [सं०] जिससे रक्त दूषित हो । खून खराब रांत भी होता है। इसमें गर्भाशय में बहुत दाह और पीड़ा करनेवाला । होती है। जब यह रोग गर्भ न रहने की दशा में होता है, रक्तष्टग-संज्ञा स्त्री० [सं० रक्तक ] कोयल । कोकिल । सब कमी कभी इसके कारण गर्भ रहने का भी धोखा वि. लाल आँखोंवाला । जिसकी आँखें लाल हों। होता है। रक्तद्रुम-संज्ञा पुं० [सं०] लाल बीजासन वृक्ष । रक्तगैरिक-संज्ञा पुं० [सं०] स्वर्ण गैरिक । गेरू। रक्तधरा-संज्ञा स्त्री० [सं०] वैद्यक के अनुसार मांस के भीतर की रक्तप्रंथि-संज्ञा स्त्री० । सं०] (1) लाल लजाबती। (२) वह रोग दूसरी कला या झिल्ली जो रक्त को धारण किये रहती है। __ जिसमें शरीर में लहू की गाँठे बंध जायें । रक्तधातु-संज्ञा पुं० [सं०] (१) गेरू । (२) ताँवा ।। रक्तपीव-संज्ञा पुं० [सं०] (१) कबूतर । (२) राक्षस । रक्तनयन-संज्ञा पुं० [सं०] (१) कबूतर । (२) चकोर । रक्तन-संशा पुं० [सं०] रोहितक वृक्ष । रक्तनाड़ी-संज्ञा स्त्री० [सं०] दाँतों की जड़ में होनेवाला एक वि. जिससे रक्त का नाश हो। प्रकार का रोग। रक्तघ्नी-संशा स्त्री० [सं०] एक प्रकार की दूब । बवूर्वा । रक्तनाल-संज्ञा पुं० [सं०] जीवशाक । सुमना । रक्तचंचु-संज्ञा पुं० [सं०] शुक । तोता। रक्तनासिक-संज्ञा पुं० [सं०] उल्स्टू । रक्तचंदन-संज्ञा पुं० [सं०] लाल रंग का चंदन । वि० दे० | रक्तनिर्यास-संज्ञा पुं० [सं०] लाल रंग का बीजासन वृक्ष । "चंदन"। रक्तनील-संज्ञा पुं० [सं० ] सुश्रुत के अनुसार एक प्रकार का पर्या-तिलपर्ण । पत्रांक । रंजन । कुचंदन । ताम्रवृक्ष । | बहुत जहरीला बिच्छू । लाल चंदन । देवी चंदन । | रक्तनेत्र-संज्ञा पुं० [सं० ] (१) सारस पक्षी । (२) कवृतर । (३) रक्तचित्रक-संशा पुं० [सं०] लाल रंग का चित्रक या चीता वृक्ष ।। चकोर । रक्तचूर्ण-संज्ञा पुं० [सं०] (१) सेंदुर । सिंदूर । (२) कमीला । वि. जिसकी आँखें लाल हों। रक्तच्छईि-संज्ञा स्त्री० [सं०] खून की के होना । रक्त-चमन । रक्तप-संज्ञा पुं० [सं०] राक्षस । रक्तजंतुक-संज्ञा पुं० [सं०] सीसा। वि. रक्त पीनेवाला। रक्तज-वि० [सं०] (1) जो रक्त से उत्पन्न हो । लहू से उत्पन्न रक्तपक्ष-संज्ञा पुं० [सं० ] गरुड़ । होनेवाला । (२) रक्त के विकार के कारण उत्पन्न होनेवाला | रक्तपट-संज्ञा पुं० [सं०] लाल रंग के कपड़े पहननेवाला, श्रमण । (रोग)। रक्तपत्र-संशा पुं० [सं०] पिंडालू । रक्तज कृमि-संज्ञा पुं० [सं० ] वह कृमि रोग जो रक-विकार के रक्तपत्रा-संज्ञा पुं॰ [सं० ] () लाल गदहपूरना । (२) नाकुली। ___कारण उत्पन्न होता है। रक्तपदी-संशा स्त्री० [सं०] लजालू । लज्जावंती। रक्तजपा-संज्ञा पुं० [सं०] अबहुल । जया । देवीफूल । रक्तपर्ण-संज्ञा पुं० [सं० ] लाल गदहपूरना । रक्तजिह्व-संज्ञा पुं० [सं०] सिंह । शेर । रक्तपल्लव-संज्ञा पुं० [सं०] अशोक का वृक्ष । वि० जिसकी जीभ लाल रंग की हो। रक्तपा-संशा स्त्री० [सं०] (1) जॉक । (२) दाकिनी। रक्तजूर्ण-संज्ञा पुं० [सं०] ज्यार । जोन्हरी। रक्तपाका-संज्ञा स्त्री० [सं०] बृहती नाम की लाता। रक्ततर-संज्ञा पुं० [सं०] स्वर्ण गैरिक । गेरू। रक्तपात-संमा पुं० [सं०] (1) लहू का गिरना या बहना । रक्तता-संशा श्री० [सं०] लालिमा । लाली । सुखी । ललाई। रक्तस्त्राव । (२) ऐसा लड़ाई-झगड़ा जिसमें लोग जख्मी रक्ततुंड-संशा पुं० [सं० ] शुक । तोता। हों। खून-खराधी । (३) ऐसा प्रहार जिससे किसी का रक वि० जिसका मुंह लाल रंग का हो। रक्ततुंडक-संज्ञा पुं० [सं०] सीसा । रक्तपाता-संशा पुं० [सं०] जोंक । रक्ततृण-संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का लाल रंग का तृण । रक्तपाद-संत्रा पुं० [सं०] (१) बरगद । (२) तोता। रक्तसृणा-संज्ञा स्त्री० [सं०] गोमूत्रिका मामक तृण । रक्तपायी-वि० [सं० रक्तपायिन् ] [स्त्री० रक्तपायिनी ] रक्तपान रक्तदंतिका-संज्ञा स्त्री० [सं०] दुर्गा का यह रूप जो उन्होंने करनेवाला । खून पीनेवाला । शुभ और निशुम को खाने के समय धारण किया था। संज्ञा पुं० मरकुण । खटमल । चंडिका। रक्तपारद-संज्ञा पुं० [सं०] हिंगुल । शिंगरफ। गुर । रक्तदंती-संञ्चा स्त्री० दे० "रक्तवंतिका"। रक्तपाषाण-संज्ञा पुं० [सं०] (1) लाल पत्थर । (२) गेरू। रक्तदला-संशा स्त्री० [सं०] मलिका नाम का गंध-मण्य । रक्तपिंड-संशा पुं० [सं० ] जया का फूल ।