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पृष्ठ:हिंदी शब्दसागर भाग 7.djvu/३२४

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पृ०२४। । पृ०७। मेसाहना ३५६३ घेहना उ०-(ज) जप तप दोसै थोथरा, तीरथ व्रत बेसास । सूवै बेस्वा तजा सिंगारू सिद्ध की गइ सिदाई ।-पलटू, सैबल सेविया, यौ जग चल्या निरास | -कबीर । पृ० १०४ । (ख) दादू पंथ बतावै पाप का, मर्म कर्म वसास । निकट वेस्वाद-वि० [हिं० बे+सं० स्वादु ] जिसमें कोई अच्छा स्वाद न निरजन जे रहे, क्यो न बतावै तास ।-दादू० बानी, हो । स्वादरहित । २. जिसका स्वाद खराब हो । बदजायका । बेहंगम-वि० [सं० विहङ्गम ] १. जो देखने में भद्दा हो। बेढंगा। बेसाहना-क्रि० अ० [देश॰] १. मोल लेना। खरीदना । उ०- जैसे, बेहंगम मूर्ति । २. बेढब । विकट । जैसे,—वह बेहगम भरत कि राउर पून न होहीं। यानेहु मोल बेसाहि कि प्रादमी है. सबसे झगड़ पड़ता है। मोहीं।-तुलसी (शब्द०)। २. जान बूझकर अपने पीछे बेहगमपन --संज्ञा पुं० [हिं० वहगम+पन (प्रत्य०) ] १. देहगम लगाना । (झगडे, बैर, विरोध, आदि के सवष में बोलते हैं)। होने का भाव । भद्दापन । बेढगापन । २. विकटता। चेसाहनी -संज्ञा स्त्री॰ [देश॰] दे० 'बेसाहा' । भयंकरता। वेसाहा-सज्ञा पुं० [हिं० वेसाहना ] खरीदी हुई चीज । सोदा। वहँसना -क्रि० प्र० [सं० विहसन, दि० विह'सना, हॅसना ] सामग्री । उ०-जेहि न हाट एहि लीन्ह वेसाहा । ताकहं प्रान ठठाकर हंसना । वि० दे० 'हँसना' । हाट फित लाहा ।—जायसी (शब्द॰) । बह-संज्ञा पु० [ स० वेध ) १. छेद । छिद्र । सुराख । उ०- बेसिक-वि० [40] मूलभूत । प्राधार रूप । मौलिक । बुनियादी। (क) भुज उपमा पोनारि न पूजी, खोन भई तेहि चित । उ.-जब तक बाधुनिक छापावाद के बेसिक शब्द कविता ठावहिं ठवि वह भे हिरदै, ऊभि सांस लेह नित । जायसी में न पावें तब तक कवि जी को संतोष नही हो सकता । -० (गुप्त), पृ० १६५। २. चोट । घाव । (ख) अनिख -प्राधुनिक०, पृ०२। चढ़े अनोखी चित्त चढ़ि उतरै न, मन मग मूदं जाको बहु -बेसिक रीडर। सब और तं-धनानद, पु०१२। बेसिलसिले-क्रि० वि० [हिं० वे+फा० सिलसिला ] बिना किसी बेह-शा स्त्री० [ ? ] बाह । भुजा । उ०-कट मैं हरि बह क्रम प्रादि के । अव्यवस्थित रूप से । उबारी । निस दिन सिमरो नाम मुरारी।-रामानंद०, बेसो-क्रि० वि० [ फ़ा० वेश ] अधिक । ज्यादा । बसु-सञ्चा पु० [सं० वेश ] दे० 'वेय' । उ०-लाल फमली बेह-वि० [फा० ] अच्छा । भला । सुदंर [को॰] । वोढ़े पेनाए । बेसु हरि थे कैसे बनाए ।-दक्खिनी०, बेहड़-० [हिं० ] दे० 'बीहड़' । पृ०१०३ बह-संज्ञा पु० दे० 'वीहड़' । उ.-बन बेहड़ गिरि कदर खोहा बेसुध-वि० [हिं० वे + सुध (= होश) ] १. अचेत । बेहोश । २. सब हमार प्रभु पग पग जोहा । —तुलसी (शब्द॰) । बेखबर । बदहवास। बेहतर'-वि० [फा० ] अपेक्षाकृत पच्छा । किसी के मुकाबले में बेसुधी 1-सञ्ज्ञा स्त्री० [हिं० वसुध + ई (प्रत्य॰)] अचेतनता। अच्छा । किसी से बढ़कर । जैसे,—चुपचाप घर बैठन से तो बेखबरी । बेहोशी । (क्व०) । वही चले जाना बहतर है। बेसुमार-वि० [फा० बेशुमार ] दे० 'बेशुमार'। उ०—कछू सूझत बेहतर -प्रव्य० प्राथना या मादेश के उत्तर में स्वीकृतिसूचक न पार परी मार बसुमार, मढ़ी भूमि भासमान धूम धाम घनघोर ।-हम्मीर०, पृ० ३१ । विशेष-प्रायः इसी पथ मे इसका प्रयोग बहुत' शब्द के साथ बेसुर-वि० [हिं० बं+सुर (= स्वर) ] संगीत प्रादि की दृष्टि से होता है। जैस,-पाप कल सुबह पाइएगा। उत्तर-बहुत जिसका स्वर ठीक न हो। बमेल स्वरवाला। उ०-चेतन बहतर। होइ न एक सुर कसे बने बनाइ । जड़ मृदग वसुर भए वेहतरो-सज्ञा मा० [फा० ) वहतर का भाव । भच्छापन । मलाई । मुहै थपेरे खाइ।-स० सप्तक, पु० २२२ । जैसे,-मापकी वहसरी इसी म है कि पाप उनका रुपया बेसुरा-वि० [हिं० बे+सुर (=स्वर) ] १. जो नियमित स्वर में न हो। जा अपने नियत स्वर से हटा हुमा हो। (संगीत)। वेद-वि० [फा०] १. जिसकी कोई सीमा न हो। असीम । २. जो अपने ठिकाने या मौके पर न हो । वमौका । अपरिमित । अपार । २.बहुत भधिक । बेस्म 2-सञ्ज्ञा स्त्री० [स० वेश्म ] गृह । घर ।-अनेकार्थे०, बेहना go [ स० वपन ] अनाज आदि का बीज जो खेत मे बोया जाता है। बीया। वेस्याल-सञ्ज्ञा स्त्री० [स० वेश्या ] दे० 'बेसा'। उ०-अपने अपने क्रि० प्र०-दालना ।-पड़ना। लाभ को बोलत बैन बनाय। बेस्या बरस घटावही जोगी वेहन -वि॰ [ ? ] पीला । जद । बरस बढ़ाय।-श्रीनिवास प्र०, पृ० २३६ । बेहना-सञ्ज्ञा पुं॰ [देथ०] १. जुलाहों की एक जाति जो प्राय: कई बेस्वाा-संज्ञा स्त्री० [सं० वेश्या ] वारांगना । वेश्या । बेसा । उ०- धुनचे का काम करती है। २.ई धुननेवाला । धुनिया। शब्द। अच्छा। 1-सञ्चा पृ०४३॥