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हिंदी-साहित्य का इतिहास


पंडित् महावीरप्रसादजी द्विवेदी की थी और दूसरी पंडित गंगाप्रसाद अग्निहोत्री की। उस समय यह आशा हुई थी कि इन अनुवादों के पीछे ये दोनों महाशय शायद उसी प्रकार के मौलिक निबंध लिखने में हाथ लगाएँ। पर ऐसा न हुआ। मासिक पत्रिकाएँ इस द्वितीय उत्थान-काल के भी बहुत सी निकलीं पर उनमें अधिकतर लेख 'बातों के संग्रह' के रूप में ही रहते थे; लेखकों के अंतःप्रयास से निकली विचारधारा के रूप में नहीं। इस काल के भीतर जिनकी कुछ कृतियाँ निबंध-कोटि में आ सकती हैं, उनका संक्षेप में उल्खेख किया जाता है।


पं॰ महावीरप्रसाद द्विवेदी का जन्म दौलतपुर (जि॰ रायबरेली) में वैशाख शुक्ल ४ सं॰ १९२७ को और देहावसान पौष कृष्ण ३० सं॰ १९९५ को हुआ।

द्विवेदीजी ने सन् १९०३ में "सरस्वती" के संपादन का भार लिया। तब से अपना सारा समय उन्होंने लिखने में ही लगाया। लिखने की सफलता वे इस बात में मानते थे, कि कठिन से कठिन विषय भी ऐसे सरल रूप में रख दिया जाए कि साधारण समझने वाले पाठक भी उसे बहुत कुछ समझ जायँ। कई उपयोगी पुस्तकों के अतिरिक्त उन्होंने फुटकल लेख भी बहुत लिखे। पर इन लेखों में अधिकतर लेख बातों के संग्रह के रूप में ही है। भाषा के नूतन शक्ति-चमत्कार के साथ नए नए विचारों की उद्भावनावाले निबंध बहुत ही कम मिलते हैं। स्थायी निबंधों की श्रेणी में दो ही चार लेख, जैसे 'कवि और कविता', 'प्रतिभा' आदि आ सकते हैं। पर ये लेखनकला या सूक्ष्म विचार की दृष्टि से लिखे नहीं जान पड़ते। 'कवि और कविता' कैसा गंभीर विषय है, कहने की आवश्यकता नहीं। पर इसमें इसी विषय की बहुत मोटी मोटी बातें बहुत मोटे तौर पर कही गई हैं, जैसे-

"इससे स्पष्ट है कि किसी किसी में कविता लिखने की इस्तेदाद स्वाभाविक होती हैं, ईश्वरदत्त होती है। जो चीज ईश्वरदत्त है वह अवश्य लाभदायक होगी। वह निरर्थक नहीं हो सकती। उससे समाज को अवश्य कुछ न कुछ लाभ पहुँचता है।