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हिंदी-साहित्य का इतिहास

सखी, नील नभस्सर से उतरा यह हंस अहा! तरता तरता।
अह तारक-मौक्तिक शेष नहीं, निकला जिनको चरता चरता।
अपने हिमबिंदु बचे तब भी चलता उनको धरता धरता।
गढ़ जायँ न कटक भूतल के, कर डाल रही ढरता डरता।
आकाशजाल सब ओर तना, रवि तंतुवाय है आज बना;
करता है पद-प्रहार वही, मक्खी सी भिन्ना रही मही।

घटना हो चाहे घटा, उठ नीचे से नित्य।
आती है ऊपर, सखी! छा कर चंद्रादित्य॥
इंद्रवधू अपने लगी क्यों निज स्वर्ग विहाय।
नन्हीं दूबों का हृदय निकल पड़ा यह हाय॥
इस उत्पल से काय में, हाय! उबल से प्राण।
रहने दे बक ध्यान यह, पावे ये दृग त्राण॥
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वेदने! तू भी भली बनी।
पाई मैंने आज तुझी में अपनी चाह घनी।
अरी वियोग-समाधि अनोखी, तू क्या, ठीक ठनी।
अपने को, प्रिय को, जगती को देखूँ खिंची तनी।
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हा! मेरे कुंजों का कूजन रोकर, निराश होकर सोया।
वह चंद्रोदय उसको उढ़ा रहा है धवल वसन-सा धोया॥
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सखि, निरख नदी की धारा,
ढलमल ढलमल चंचल अंचल, झलमल झलमल तारा।
निर्मल जल अंतस्तल भरके, उछल उछल कर छल छल करके,
थल थल तर के, कल कल धर के बिखरती है पारा।
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ओ मैरे मानस के हास! खिल सहस्रदल, सरस सुवास।
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