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हिंदी-साहित्य का इतिहास

किंतु उसी क्षण भूख-प्यास से विकल वस्त्र-वंचित अनाथगण,
'हमें किसी की छाँह चाहिए' कहते चुनते हुए अन्न कण।
आ जाते हैं हृदयद्वार पर, मैं पुतार उठता हैं तत्क्षग-
हाय! मुझे धिक् है, जो इनका कर न सका मैं कष्ट-निवारण।
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उमड़-घुमड़ कर जब घमंड से उठता है सावन में जलधर,
हम पुष्पित कदंब के नीचे झूला करते है प्रति वासर।
तड़ित-प्रभा या घनगर्जन से भय या प्रेमाद्रेक प्राप्त कर,
वह भुजबंधन कस लेती है, यह अनुभव है परम मनोहर।
किंतु उसी क्षण वह गरीविनी, अति विषादमय जिसके मुँह पर,
घुने हुए छप्पर की भीषण चिंता के है घिरे वारिधर,
जिसका नहीं सहारा कोई, आ जाती है दृग के भीतर,
मेरा हर्षं चला जाता है एक आह के साथ निकलकर।

(स्वप्न)

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प्रति क्षण नूतन वेष बना कर रंग-बिरंग निराला।
रवि के संमुख थिरक रही है नभ में वारिद माला॥
नीचे नील समुद्र मनोहर ऊपर नील गगन है।
घर पर बैठ बीच में विचरूँ, यही चाहता मन है॥
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सिंधु-विहग तरंग-पंख को फड़का कर प्रति क्षण में।
है निमग्न नित भूमि-अंक के सेवन में, रक्षण में॥

(पथिक)

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मेरे लिये खड़ा था दुखियों के द्वार पर तू।
मैं बाट जोहता या तेरी किसी चमन में।
बन कर किसी के आँसू मेरे लिये बहा तू।
मैं देखता तुझे था माशूक के बदन में।

(फुटकल)