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हिंदी-साहित्य का इतिहास

की कविता जिस रूप में चल रही थी उससे संतुष्ट न रहकर द्वितीय उत्थान के समाप्त होने के कुछ पहले ही कई कवि खड़ी बोली काव्य को कल्पना का नया रूप रंग देने और उसे अधिक अंतर्भावव्यंजक बनाने से प्रवृत्त हुए जिनमें प्रधान थे सर्वश्री मैथिलीशरण गुप्त, मुकुटधर पांडेय और बदरीनाथ भट्ट। कुछ अँगरेजी ढर्रा लिए हुए जिस प्रकार की फुटकल कविताएँ और प्रगीत मुक्तक (Lyrics) बँगला से निकल रहे थे उनके प्रभाव से कुछ विशृंखल वस्तुविन्यास और अनूठे शीर्षकों के साथ चित्रमयी, कोमल और व्यंजक भाषा में इनकी नए ढंग की रचनाएँ संवत् १९७०-७१ से ही निकलने लगी थी, जिनमें से कुछ के भीतर रहस्य-भावना भी रहती थी।

गुप्त जी की 'नक्षत्रलिपात' (सन् १९१४), अनुरोध, (सन् १९१५), पुष्पाजलि (१९१७), स्वयं आगत (१९१८) इत्यादि कविताएँ ध्यान देने योग्य हैं। 'पुष्पांजलि' और 'स्वयं आगत' की कुछ पंक्तियाँ आगे देखिए-

(क) मेरे आँगन का एक फूल।
सौभाग्य-भाव से मिला हुआ, श्वासोच्छ्वासन से हिला हुआ,

संसार-विटप में खिला हुआ,
झड़ पड़ा अचानक झूल-झूल।

(ख) तेरे घर के द्वार बहुत है किससे होकर आऊँ मैं?
सब द्वारों पर भीड़ बड़ी है कैसे भीतर जाऊँ मैं।

इसी प्रकार गुप्तजी की और भी बहुत-सी गीतात्मक रचनाएँ है, जैसे-

(ग) निकल रही है उर से आह,
ताक रहे सब तेरी राह।
चातक बड़ा चोंच खोले है, संपुट खोले सीप खड़ी,
मैं अपना घट लिए खड़ा हूँ, अपनी अपनी हमें पड़ी।

(घ) प्यारे। तेरे कहने से जो यहाँ अचानक मैं आया।
दीप्ति बढ़ी दीपों की सहसा, मैंने भी ली साँस, कहा।
सो जाने के लिये जगत् का यह प्रकाश मैं जाग रहा।