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हिंदी-साहित्य का इतिहास

'प्रसाद' की रचनाओं में शब्दों के लाक्षणिक वैचित्र्य की प्रवृत्ति उतनी नहीं रही हैं जितनी साम्य की दूरारूढ़ भावना की। उनके उपलक्षण (symbols) सामान्य अनुभूति के मेल में होते थे। जैसे-

(१) झंझा झकोर गर्जन हैं, बिजली है, नीरदमाला।
पाकर इस शून्य हृदय को, सबने आ डेरा डाला॥

(झंझा झकोर=क्षोभ, आकुलता। गर्जन=वेदना की तड़प। बिजली=चमक या टीस। नीरदमाला=अंधकार। शून्य शब्द विशेषण के अतिरिक्त आकाश वाचक भी है, जिससे उक्ति में बहुत सुंदर समन्वय आ जाता है)।

(२) पतझड़ या, झाड़ खड़े थे सूखे से फुलवारी में।
किसलय दल कुसुम बिछाकर ए तुम इस क्यारी में॥

(पतझड=उदासी। किसलय दल कुसुम=वसंत=सरसता और प्रफुल्लता)-आँसू'

(३) काँटों ने भी पहना मोती। (कँटीले पौधों=पीड़ा पहुंचाने वाले कठोर-हृदय मनुष्य। पहना मोती=हिमबिंदु धारण किया=अश्रुपूर्ण हुए)-'लहर'

अप्रस्तुत किस प्रकार एकदेशीय, सूक्ष्म और धुँधले पर मर्मव्यंजक साम्य की धुंधला-सा आधार लेकर खड़े किए जाते हैं; यह बात नीचे के कुछ उद्धरणों से स्पष्ट हो जायगी-

(१) उठ री लघु लघु लोल लहर।
करुणा की नव अँगड़ाई-सी, मलयानिल की परछाई सी,
इस सूखे तट पर छहर छहर॥

(लहर=सरस-कोमल भाव। सुखा तट=शुष्क जीवन। अप्रस्तुत या उपमान भी लाक्षणिक हैं।)

(२) गूढ़ कल्पना-सी कवियों की, अज्ञात के विस्मय-सी।
ऋषियों के गंभीर हृदय-सी बच्चों के तुतले भय-सी।-'छाया'

(३) गिरिवर के उर से उठ उठ कर, उच्चाकांक्षाओं-से तरुवर हैं झाँक रहे नीरव नभ पर। (उठे हुए पेड़ों को साम्य मनुष्य के हृदय की उन उच्च 'आकांक्षाओं' से जो लोक के परे जाती हैं।)

(४) बनमाला के गीतों-सा निर्जन में बिखरा है मधुमास॥