पृष्ठ:हिंदी साहित्य का इतिहास-रामचंद्र शुक्ल.pdf/७०७

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ जाँच लिया गया।
६८२
हिंदी-साहित्य का इतिहास

संग्रह का नाम 'लहर' रखा गया। 'लहर' से कवि का अभिप्राय उस आनंद की लहर है जो मनुष्य के मानस में उठा करती है और उसके जीवन को सरस करती रहती है उसे ठहराने की पुकार अपने व्यक्तिगत नीरस जीवन को भी सरल करने के लिये कही जा सकती है और अखिल मानव-जीवन को भी। यह जीवन की लहर भीतर उसी प्रकार स्मृति-चिह्न छोड़ जाती है जिस प्रकार जल दी लहरें सूखी नदी की बालू के बीच पसलियों की-सी उभरी रेखाएँ छोड़ जाती हैं-

उठ, उठ, गिर गिर, फिर फिर आती।
नर्त्तित पद-चिह्न बना जाती;
सिकता की, रेखाएँ उभार,
भर जाती अपनी तरल सिहर।

इनमें भी उस प्रियतम का आँख-मिचौनी खेलना, दबे पाँव आना, किरन-उँगलियों से आँख मूँदना (या मूँदने की कोशिश करना क्योंकि उस ज्योतिर्मय का कुछ आभास मिल ही जाता है) प्रियतम की ओर अभिसार इत्यादि रहस्यवाद की सब सामग्री है। प्रियतम अज्ञात रहकर भी किस प्रेम का आलंबन रहता है, यह भी दो-एक जगह सूचित किया गया है। जैसे-

तुम हो कौन और मैं क्या हूँ? इसमें क्या है धरा, सुनो।
मानस जलधि रहे चिर चुंबित, मेरे क्षितिज! उदार बनो।

इसी प्रकार "हे सागर संगम अरुण नील!" में यह चित्र सामने रखा गया है कि सागर ने हिमालय से निकली नदी को कब देखा था, और नदी ने सागर को कब देखा था पर नदी निकल कर स्वर्ण-स्वप्न देखती उसी की ओर चली और वह सागर भी बड़ी उमंग के साथ उससे मिला।

क्षितिज, जिसमें प्रातः-सायं अनुराग की लाली दौड़ा करती है, असीम (आकाश) और ससीम (पृथ्वी) का सहेट या मिलन-स्थल-सा दिखाई पड़ा करता है। इस हलचल-भरे संसार से हटाकर कवि अपने नाविक उसे वहीं ले चलने को कहता है-